माँ धरा में निवेश

पूर्ण हुए विज्ञान के अनंत शोध,

धरा के सिवा न कहीं गृह-बोध।

विडंबना है यह बड़ी दुःखद,

धरा-तनय ही हैं, वजह वेदन,

तरु,पादप और चरिंद-परिंद।

भूतल  ही  गृह है  निर्विवाद।

तापमान, प्रदूषण-स्तर बढ़ा,

हिम-द्रवण  से भू का रक्षण। 

तो, भोजन-श्रृंखला की  रक्षा

हेतु  करें हम  स्वधर्म-अर्पण।

मानवता के  कल  को, देंगे

सुखद भविष्य की  शुभेषणा,

संयुक्त राष्ट्र की भावना  यह

माँ धरा में निवेश -संकल्पना।

अपशिष्ट में करते हम कटौती,

पुनः प्रयोग, पुनर्चक्रण नियम।

अल्प-जल में  शुद्ध  तकनीक,

प्राकृतिक-संसाधन  स्नेह-क्षेम।

अवनि - वेदना होती  विलुप्त,

पर्यावरण रक्षा,सेवा से हर्षित।

हर जीव -जंतु होते सम्मानित,

मानव-धर्म  पावन  विभूषित।


@ मीरा भारती

 पुणे,महाराष्ट्र।