अनेक विद्वानों के रूप में आज भी डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य जीवित हैं

सागर। साहित्याचार्य डॉ. पं. पन्नालाल जैन वह नाम है जिसने हजारों छात्रों को विद्यारूपी छैनी से तरासकर विद्वान बनाया जो आज देश के विभिन्न प्रान्तों में अपने वैदुष्य की पताका फहरा रहे हैं। यही नहीं आपने आचार्य श्री विद्याासागर जी मुनिमहाराज जैसे साधुओं को भी अध्यापित किया है। साहित्याचार्य जी गुरुओं के गुरु हैं। आपने अनेक संस्कृत-प्राकृत-हिन्दी रचनाओं व संपादित ग्रन्थों ने देश की साहित्यिक संस्कृति को समृद्ध किया है। साहित्याचार्य जी ने विद्वानों के हितों की रक्षार्थ पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी के साथ मिलकर श्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद की स्थापना की, उसमें आप अनेकों वर्षों तक पदाधिकारी रहे। ये विचार शनिवार को सागर में जैन भ्रातृ संघ द्वारा साहित्याचार्य डॉ. पन्नालाल जैन 111वीं जन्म जयन्ती समारोह में आमंत्रित मुख्य वक्ताओं ने रखे। श्री राकेश जैन सागर ने बताया कि इस समारोह में मुख्य रूप से स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष श्री सुखदेव बाजपेयी, जैन पब्लिक स्कूल के प्राचार्य श्री रजनीश जैन, पार्षद श्री राजेश केशरवानी, जैन भ्रातृ संघ के अध्यक्ष अजित मलैया, वरिष्ठ समाजसेवी श्री कैलाश सिंघई, राकेश जैन आदि ने सभा को संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन अशोक जैन पिडरुआ ने किया, आभार डॉ. राजेश जैन ने व्यक्त किया।

डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य का जन्म सागर जिला के पारगुवां ग्राम में 5 मार्च 1911 को हुआ। पिता का बाल्यावस्था में स्वर्गवास होने के कारण उनकी माता श्रीमती जानकी बाई 7-8 वर्ष की आये में सागर लेकर आ गईं।

यहाँ उन्हें पूज्य सन्त गणेश प्रसाद जी वर्णी का सान्निध्य मिला। उनकी शिक्षा उन्हीं के मार्गदर्शन में हुई। सन् 1936 में साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त कर जैन समाज के प्रथम साहित्याचार्य बने।

पूज्य वर्णी जी के प्रति उनकी बहुत आस्था रही। उनके आदेश पर आपने श्री गणेश वर्णी दि. जैन संस्कृत महाविद्यालय, मोराजी सागर में अपनी ऐवाएं प्राध्यापक एवं बाद में प्राचार्य के पद पर रहकर दीं। आप इस विद्यालय में सन् 1931 से 1986 तक लगभग 56 वर्ष तक निरन्तर कार्यरत रहे। इस दौरान आपने हजारों विद्यार्थियों को शिक्षित किया, जो आज देश में सर्व़ विद्यालय का नाम रोशन कर रहे हैं।

सन् 1060 में भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी से आपका साहित्यिक गतिविधियों को लेकर साक्षात्कार हुआ। इसी विद्यालय में सेवारत रहते हुए सन् 1069 में भारत सरकार द्वारा आदर्श शिक्षक के रूप में राष्ट्रीय पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वीवी गिरि के करकमलों द्वारा प्राप्त किया गया।

क्षुल्लक गणेश प्रसाद वर्णी को आप अपना जीवन निर्माता मानते थे। उनकी दैनिक-दैनन्दनी से संकलित कर आपने उनकी आत्मकथा को ‘मेरी जीवन गाथा’ के नाम से संपादन कर प्रकाशित कराया। यह 2 भागों में है। आपने अनेका प्राकृत संस्कृत के ग्रन्थों का संपादन किया। आपको युगों तक विस्मृत नहीं किया जा सकेगा।

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर 9826091247