पारिस्थितिकी सन्तुलन में वन्य-जीवों की भूमिका महत्वपूर्ण


सुरक्षित आवास व समय पर सहायता से संरक्षित होंगें वन्य जीव-जन्तु

वन्य जीवों व वनस्पति को बचाने व संरक्षित करने को लेकर दुनिया भर में प्रतिवर्ष 3 मार्च को विश्व वन्य जीव दिवस के रूप में मनाया जाता है । इसके माध्यम से वन्य जीवों और वनस्पतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने, वन्य जीवों को संरक्षण देने के साथ-साथ जैव विविधता व पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाना मुख्य उद्देश्य रहा है । संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसंबर 2013 को प्रतिवर्ष 3 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस के रूप में अपनाने की घोषणा की ।  अर्थात् 3 मार्च 2014 से लेकर अब तक प्रतिवर्ष वैश्विक स्तर वन्य-जीव दिवस तो मनाया जाने लगा परन्तु वन्य-जीवों के निर्भय जीवन-यापन के लिए अब तक हम पर्याप्त व्यवस्थाएं एवं सुविधाएं तैयार नही कर पाएं है । बल्कि विकास के नाम पर हमने वन्य-जीवन के लिए नई दुविधाएं व संकट पैदा किए है ।

  विश्व वन्यजीव दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य विश्वभर में वन्यजीवों की सुरक्षा तथा वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के प्रति लोगों को जागरूक करना रहा है  । जिसको लेकर दुनिया भर में अलग-अलग प्रकार के कानून एवं व्यवस्थाएं की गई है । ऐसे में भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 9 सितंबर, 1972 को लागू हुआ था और इसको लागू करने का मकसद जानवरों, पक्षियों, पौधों और उससे जुड़े मामलों को निपटना और जानवरों को सुरक्षा पहुंचाना था। वे जानवर जो पूरी तरह से जंगल के माहौल में रहते हैं। ऐसे जानवरों और पौधों की प्रजातियों का संरक्षण जरूरी है ताकि वे विलुप्त होने के खतरे से बाहर हो सकें तथा पारिस्थितिकी सन्तुलन बना रहे । जंगली जानवर और पौधे हमारे  पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । वन्य जीव-जन्तु और पौधे हमारी प्रकृति में सुंदरता को जोड़ते हैं। उनकी विशिष्टता, कुछ पक्षियों और जानवरों की सुंदर छवि और आवाजें, वातावरण और निवास स्थान को बहुत ही मनभावन और अद्भुत बनाती है।

  वर्तमान की भोग एवं विकासवादी संस्कृति हमारे प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव की उन्नत और जीओ और जीने दो की संस्कृति को नुकसान पहुंचाती जा रही है । इंसान के विचारहीन कर्म एवं गैर-जिम्मेदार रवैये से बड़े पैमाने पर वन्यजीव प्रजातियों के जीवन पर संकट आ गया है । ऐसे कई कारक हैं जो वन्यजीव प्राणियों के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। आज हम देखते है कि बढ़ता प्रदूषण, तापमान और जलवायु परिवर्तन, संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्राकृतिक निवास का नुकसान, जनसंख्या विस्फोट व शहरीकरण, अनियमित शिकार या अवैध शिकार, निवास स्थान की हानि, पेड़-पौधों का दु्रतगति से विनाश आदि वन्यजीवों की समाप्ति अथवा संकट के प्रमुख कारण रहे हैं।

  वन्यजीवों के संरक्षण के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। सरकार द्वारा पहले से ही संरक्षण उद्देश्यों के लिए काम कर रही कई नीतियों, योजनाओं तथा पहल को और अधिक पुख्ता व सख्त करने की आवश्यकता है । जंगली जानवरों और पेड़-पौधों को अपने स्वयं के आवास के भीतर ही संरक्षित करने के प्रयास बड़े पैमाने पर किये जाने चाहिए । वन्य-जीवों को सुरक्षित जीवन देने के लिए हमें उनके आवास स्थलों के समीप ही अधिक से अधिक रेस्क्यू सेन्टर अर्थाव बचाव केन्द्रों की स्थापना करनी चाहिए । कई जीवों केा समय पर सहायता अथवा उपचार मिलने से उन्हें बचाया जा सकता है । हमें देश और दुनिया भर में अधिक से अधिक उद्यान, अभयारण्य, जीवमंडल भंडार आदि की स्थापना करने के साथ-साथ ओरण-गोचर, देववन, रूंध, चारागाह आदि को भी पूर्ण संरक्षण देने की जरूरत है । सार-संक्षिप्त यही है कि वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में सरकार एवं समुदाय स्तर पर नए सिरे से चिन्तन एवं मन्थन की सख्त जरूरत है ।

मुकेश बोहरा अमन

बाड़मेर राजस्थान