योगी की ताजपोशी, बसपा और सपा को सबक

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों को लेकर कई तरह की चर्चाओं के बीच बसपा को लेकर कई तरह की चर्चाए है। होना भी चाहिए जिस दल का उत्तर प्रदेश की राजनीति में अच्छा खासा दबदबा रहा हों उस दल को उत्तर प्रदेश में एक सीट मिलना किसी आश्चर्य से कम नही है। उत्तर प्रदेश में एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है। लेकिन इस सरकार की पुनर्रावृत्ति में सरकार की उपलब्धियों से ज्यादा बसपा ने अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई है। राजनैतिक विशेषज्ञों की बॉतों पर गौर करे तो अगर बसपा थोड़ा सा प्रयास करती और पचास का आंकड़ा पार कर लेती तो यह भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती थी। 

चुनाव से पूर्व भारी भरकम रैलियों की शुरूआत होते ही सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं पदाधिकारियों में आए अतिउत्साह, धमकियों और सहयोगी दलों की बेअंदाज भाषाओं ने सपा की गुण्डई वाली छबि को उभार दिया जिसका पूरा फायदा भाजपा को मिला। अखिलेश यादव के अतिप्रयास, परिवारवादी और एमवाई से हटकर बनाई गई छबि का का यह परिणाम तो सामने आया कि पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में उन्हें ठीक ठाक सीटे हासिल हुई लेकिन सपा की पुरानी छबि का असर उन्हें सत्ता हासिल करने में रोड़ा साबित हुआ।

 यह चौकाने वाला एक फिगर सामने आया कि बसपा को भले ही इस चुनाव में एक सीट मिली हो लेकिन उसे एक करोड़ अठरह लाख वोट प्राप्त हुए। अब वोटों के गणित को समझे तो पता चलेगा कि अगर बसपा ने बेहतर तरीके से चुनाव लड़ा होता तो वह लगभग पचास सीटे लाने में कामयाब होती। सपा ने लगभग 77 सीटे 200 से 13000 के अन्तर से गवाई, 27 सीटों पर वह पॉच हजार से कम मतों से हारी। प्रदेश में अगर 41.03 प्रतिशत यानि 3.8051,721 वोट पर भाजपा ने 255  तो सपा ने 32.06 प्रतिशत यानि 2,95,43,934 वोट पाकर 125 सीटे हासिल कर दूसरे स्थान पर रही। अब ऐसे में अगर बॉत करे बसपा की तो बसपा ने भले ही 1 करोड़ 18 लाख वोट हासिल किए हो लेकिन उसे सीट एक ही मिली। 

यही नही अगर कर्मचारियों के पुराने पेंशन बहाली को लेकर चलाए गए अभियान की बॉत की जाए तो इसका भी व्यापक असर भाजपा को पड़ा और सपा द्वारा की गई घोषणा के कारण कर्मचारियों का पोस्टल बैलेट सपा के पक्ष में गया। पोस्टल बैलेट ने पचास सौ नही बल्कि 312 सीटों पर सपा को बढ़त दिलाई। बेरोजगारी, महंगाई, आवरा पशुओं सहित कई मुद्दों को आधार बनाकर चुनाव में उतरी सपा के लिए गड्डा युक्त, सड़के, बेरोजगारी और महंगाई पर राशन, शासन, गैस, चना, किसान निधि जैसी योजनाएं भारी पड़ी।लखनऊ विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के प्रफेसर पवन मिश्र कहते हैं कि मुफ्त राशन एक ऐसा मुद्दा रहा, जिसने किसान, हिंदू-मुस्लिम और जातियों के बंधन को तोड़ दिया। 

इसके साथ भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का जो तड़का लगाया, उसने इस चुनाव में काफी असर दिखाया। तीसरी सबसे बड़ी बात यह कि भाजपा ने कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए प्रदेश में सपा के लिए संदेश दिया कि वह सत्ता आ गई तो अराजकता और गुंडागर्दी बढ़ जाएगी। बसपा का कमजोर पड़ना भाजपा के लिए काफी फायदेमंद रहा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबी और प्रभावी भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी का प्रदर्शन 2022 के विधान सभा चुनावों में अब तक सबसे खराब रहा है और कुल 403 सीटों में से उसे महज 1 सीट मिली है। बलिया से प्राप्त सूचना के अनुसार, जिले की रसड़ा विधान सभा सीट से बसपा के मौजूदा विधायक और विधानमंडल दल के नेता उमाशंकर सिंह तीसरी बार अपनी सीट बचाने में सफल रहे हैं। अब सिर्फ एक सीट पाने के बाद अगर मायावती हार जीत का ठीकरा मीडिया और मुस्लिम मतदाताओं पर ठोके तो यह उनकी उस समाज के लिए बड़ी गैरजिम्मेदारी है जिसकी बदौलत एक बार नही बल्कि चार बार उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे के मुखिया का सुख उन्होंने लूटा है। 

एक वक्त था जब बसपा का वोट शेयर उत्तर प्रदेश में 20 फीसदी से ज्यादा हुआ करता था और उसने सरकार भी बनाई। बसपा को 2017 के विधान सभा चुनाव में 19 सीटें मिली थीं. 2012 में उसे 80 से कम सीटें मिली थीं, जो 1991 के बाद सबसे कम थीं, जब पार्टी को 12 सीटें मिली थीं. 2007 में, 206 सीटें जीतकर बसपा ने सरकार बनाई थी। विधान सभा चुनाव 2017 में, बसपा ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसका वोट शेयर 22.2 प्रतिशत था. हालांकि, उसके उम्मीदवारों की 81 सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी। 

उत्तर प्रदेश में बसपा का मजबूत आधार माने जाने वाले दलित समुदाय की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है. बसपा ने राज्य में 4 बार अपनी सरकार बनाई है, जिसमें एक पूर्ण बहुमत की सरकार भी शामिल है. पार्टी 1993 में सपा के नेतृत्व वाली सरकार का भी हिस्सा थी। 2001 में बसपा अध्यक्ष बनने वाली मायावती 4 बार राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। ऐसे में 2022 में उनके नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी का जो हश्र हुआ है उस पर उगली उठना तो लाजिमी है। चुनाव से पहले भाजपा यह समझ चुकी थी कि यह चुनाव उनके लिए आसान नहीं था। पांच साल आप कितना भी काम कर लीजिए, कुछ न कुछ कमी रह जाती है। 

उनके विपक्षियों को लगता था कि कोरोना की दूसरी लहर के समय नदियों में बहती लाशें और उनके किनारे दफनाए गए शव मतदाता के मन में रिसते हुए नासूर की तरह रच-बस गए हैं। वे इसका बदला चुकाएंगे।यही नहीं, महंगाई, बेरोजगारी और खेतों को रौंदते छुट्टा जानवर विपक्ष को मुद्दा देने के लिए काफी लग रहे थे। अपनी ही पार्टी के तीन मंत्रियों और लगभग एक दर्जन विधायकों का विद्रोह घातक साबित हो सकता था।इसकी वजह यह थी कि पिछले सात वर्षों में भगवा दल के रणनीतिकारों ने अति-पिछड़ों के साथ दलितों के बीच खासी दखल बनाई थी। उनमें टूट-फूट तो हो सकती थी, पर वे एकतरफा कहीं जाएंगे, इसकी संभावना शून्य थी। 

यही नहीं, कानून-व्यवस्था के मामले में योगी से सियासी रार रखने वाले लोग भी उनकी आलोचना करने से कतराते थे। वह अपने काम से ही नहीं, बल्कि चोले से भी बहुसंख्यक मतदाताओं के बड़े समूह को प्रभावित करते हैं। ऐसे में योगी की इस जीत के पीछे अगर बसपा की सुस्ती और सपा के अतिउत्साह का सहयोग रहा तो रही सही कसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उत्तर प्रदेश की कमान न संभाली। काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण से वहां के ‘रोड-शो’ और 32 सार्वजनिक चुनावी रैलियां , 12 वर्चुअल सभाओं और पिछले सात सालों से लोगों को शौचालय, प्रधानमंत्री आवास, रसोई गैस और जो अन्य सुविधाएं केंद्रीय हुकूमत की ओर से मुहैया कराई जाती रहीं, मुफ्त राशन ने उनके प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया। इधर अखिलेश यादव की मुसीबत भी यही थी। भारतीय जनता पार्टी के पास चेहरे, संसाधन, कार्यकर्ताओं और आनुषंगिक संगठनों का सहयोग था। 

इसके उलट वह अकेले थे, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अल्पसंख्यकों, अति-पिछड़ों और जाटों में ऐसा तालमेल बनाया, जिसने भगवा दल के कर्ताधर्ताओं को शुरुआती दौर में हैरान कर दिया। यही नहीं, भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के चक्रव्यूह में फंसने के बजाय उन्होंने कर्मचारी, कृषक, कामगार महिला और छात्र-वर्ग पर जोर दिया। अखिलेश यादव की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ से उनके प्रशंसक समझ बैठे कि ‘भैया’ की बातें लोगों के दिल को छू रही हैं। लेकिन यह सौ फीसदी सच है कि भीड़ जीत की गारंटी नहीं हो सकती।अगर  प्रियंका गांधी की बात की जाए तो जर्जर संगठन और संसाधन सीमित होने के बावजूद वह ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ जूझ पड़ीं। रणनीतिक तौर पर फैसला गलत नहीं था। 

पिछले चार चुनावों के दौरान ग्रामीण महिलाओं के मत-प्रतिशत में शहरी महिलाओं के मुकाबले लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। तय है, इस जनादेश ने सभी पार्टियों के समक्ष कुछ चुनौतियां,भाजपा को यह सोचना होगा कि पिछले बार से प्रदर्शन कमजोर क्यो रहा, उपमुख्ययमंत्री सहित कई मंत्री क्यो हारे, सपा को अतिउत्साह और गुण्डई वाली राजनीति से मुक्ति लेनी होगी तो कांग्रेस पुराने ढ़रे और परिवारवाद से मुक्ति का सबक लेगा। इस परिणाम से सबसे बड़ा सबक बसपा और उसके कार्यकर्ताओं को लेना होगा और अपनी मुखिया से मुखर सवाल करने होगे।