जमीन का टुकड़ा

ज़मीन का टुकड़ा हूँ मैं करता हूँ सबसे प्यार

कहीं पर उपजाऊ हूँ मैं पर कहीं पर बेकार

बांट दिया मुझको इंसान ने सरहदें बना दी

मेरे ही लिए फिर भी सब कर रहे तकरार


मेरे लिए ही देखो बंट गए कई परिवार

भाई ने ही भाई की दिया मौत के घाट उतार

खानदानी रंजिश में डूब गए मेरे लिए

तबाह हो गए मुझे पाने को कई परिवार


उपजाऊ कहीं पर है कहीं घने जंगल पहाड़

कहीं चल रहा हल मुझ पर कहीं चले मशीन

कहीं पर मैं सोना उगल रही कर रही मालामाल

कहीं पर लोग कहते हैं मुझे बंजर कदीम


पहले एक हिस्सा था अब चार हो गए

भाईयों में था जो प्यार मोहब्बत वो सब खो गए

खेत बीड़ बन्ने पर अब रोज़ होती है लड़ाई

मुझको अपना बनाते कई चिर निद्रा में सो गए


दुनियाँ का पेट भरता है मेरे ही अन्न से

उतार नहीं पायेगा उम्र भर कोई मेरा कर्ज़

पूरी दुनियां का बोझ भी उठाती हूँ मैं ही

फिर भी इंसान की तरह नहीं हूं मैं खुदगर्ज़


आदमी मिट्टी में पैदा हुआ मिट्टी से बना यह शरीर

खत्म हो जाएगा दो गज ज़मीन में दफन हो जाएगा

ज़मीन के जिस टुकड़े के लिए लड़ता रहा उम्र भर

यहीं रह जायेगा वह टुकड़ा साथ नहीं ले पायेगा


रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं

बिलासपुर हि प्र