अकस्मात वो छोड़ गये

वह प्रेम पथिक को भूल गये।

दिनचर्या जिससे शुरू होती थी,

वह आज उसी को तन्हा छोड़ गयें।

नित गली से तुम्हारे गुजरता हूँ मैं,

आजकल तुम हमें ना दिखाई दियें।

खिड़कियां बन्द हैं बहुत दिन से,

क्या हमें तुम सच में भूला ही दियें।

जाने किस रंग में तुम कहाँ खो गई,

बिन बताये हमें किसके संग हो गई।

हर जगह तुमको मैं ढूंढता नित रहाँ,

होकर पागल विरह में नित रोता रहाँ।

जो भी सपने सजाए थे तुम संग कभी,

आज एक क्षण में वह सब बिखर गया।

अब भी उम्मीद मन में है आओगें तुम,

इसी आस में जिन्दा आज मैं रह गया।

हर तरफ अब मेरे तिमिर छा रहाँ,

मेरे नयनों से ओझल वो हो गया।

हर घड़ी उसके बारे में हूँ अब सोचता,

सारी दुनिया से मैं अब अलग हो गया।

प्रभात गौर

प्रयागराज उत्तर प्रदेश।