महादेवी

आत्मा जिसकी, मंदिर की आरती,

प्रेम पीर-सी वाणी, देवी को नमन।

नेह,  मैत्री,  करुणामय  रचना  से,

करें अंतर -बाहर की पीड़ा-शमन।

विचारों  के दीप  जलाएं  प्रतिपल,

क्षीण-प्रकाश में पिया दर्शन आश।

संत-भाव रखतीं युग की देहरी पर,

प्रातः में  प्रेम-मिलन का अहसास।

बालपन,बुद्ध-करुणा का खिंचाव,

करता  भिक्षुणी बनने को  प्रेरित।

बुद्ध-संत  करते ओट  से संलाप,

नारी-मन हुआ स्वाभिमान उदित।

विश्व-दुःख की छाया से हुईं परिचित,

दुःख बना,कवि के अंतः का काव्य।

सुख नहीं  भरें हम में, मानवता-प्रेम,

सघन दर्द में,करतीं प्रवेश मनु-ह्रदय।

लोक-स्नेह तीव्रता,होती जबअनुभूत,

जोड़ें कबीर के दम्पति-प्रेम भाव से,

बनता अपार्थिव  उनका  प्रेम-संबंध,

वेदांत -अद्वैत  के  छाया रहस्य  से।


@ मीरा भारती,

 पुणे ,महाराष्ट्र।