डरा हुआ आदमी

जिम्मेदारीओं के बोझ तले

दबा हुआ आदमी

देखो चला जा रहा

डरा हुआ आदमी


माँ बाप का केवल वो सहारा है

पत्नी के आसमान का तारा है

बहनों की जरूरतों पर मिटा हुआ आदमी

देखो चला जा रहा

डरा हुआ आदमी


चिंता है चूक न जाएँ

अपने मेरे रूठ न जाएं

दर्दो ओ गम ले खामोशी में गूँथा हुआ आदमी

देखों चला जा रहा

डरा हुआ आदमी।


ऑफिस में डांट सुनकर

अपनों से ताने बात सुनकर

छटपटा जाता है भला हुआ आदमी

देखों चला जा रहा

डरा हुआ आदमी।


अपनी कई इच्छाओं को वो मारता है

दिल करता है उसे कभी न पुकारता है

चाक सा इर्द गिर्द घूमता हुआ आदमी

देखों चला जा रहा

डरा हुआ आदमी।


वो क्यों इतना डरता है?

क्या वो बोझ ढ़ोने को जन्म लिया है?

समाज के कुरीति में पिसा हुआ आदमी

देखों चला जा रहा

डरा हुआ आदमी।


-- चंचल सिंह साक्षी

सीतामढ़ी , बिहार