वो नहीं आये ---

अनीता और रमन दो बदन एक जान । कब साथ साथ खेलते कूदते प्राइमरी स्कूल से डिग्री कालिज में आगये ।  दोनों के परिवार में भी बहुत घनिष्ठता थी । अनीता के  परिवार में उसकी शादी की बात चलने लगी । अनीता आज बहुत सुस्त  थी । वह अभी शादी के लिये सहमत नहीं थी । जब वह रमन से मिली बोली रमन क्या तुम मुझसे प्यार करते हो । रमन अपलक उसका मुंह देखता रहा । अचानक उसने उसके माथे को चूमा और कहा अपनी जान से भी अधिक पर अभी मुझे आगे पढ़ने बाहर जाना है। जब तक मैं अच्छी तरह स्वयं पर निर्भर ना हो जाऊं क्या तब तक मेरा इन्तजार करोगी । अनीता ने कहा हां बस चाहे मुझे अपने परिवार समाज से लड़ना क्यों ना पड़े ।

        अनीता ने शादी की बिलकुल मना कर दिया और कहा मुझे अभी आगे पढ़ना है। रमन विदेश चला गया अनीता  भी कालिज में पढ़ाने लगी । समय बीत रहा था घर वालों ने भी उससे कहना बन्द कर दिया । तीन साल होगये वह जब भी रमन से बात करती कहती रमन तुम्हें अपना वायदा याद है ना मुझे याद है मै इन्तजार करूंगी । आज उसके इन्तजार करने का समय खत्म होने वाला था क्योंकि आज रमन अपने देश आ रहा था । वह तो बस उसकी बांहो में समाने को आतुर थी और क्यों ना हो उसके बचपन का साथी लड़ते झगड़ते कब प्यार कर बैठे पता ही ना चला । जैसे जैसे समय बीत रहा था बैचेनी बढ़ रही थी । अचानक नीचे शोर सुनाई दिया उसने जाकर देखा मां पापा और घर के अन्य सदस्य टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज देख कर चीखे थे न्यूज थी यू एस से आने वाला प्लेन क्रैश होगया । सारे यात्री खत्म हो गये ‌। उसी में उसका रमन भी था । वह तो इन्तजार ही करती रह गयी वह बिलकुल बेजान हो गयी । बस कहती रहती आजाओ मै इन्तजार कर रही हूँ । दूर कहीं गाना बज रहा था " लो आगयी उनकी याद वो नहीं आये।  "

स्व रचित

डॉ. मधु आंधीवाल

अलीगढ़ ,madhuandhiwal53@gmail.com