नारी और स्वतंत्रता

नारी और नर प्रकृति में दो समान स्वतंत्र महत्व की सत्ताएं हैं। नवीन सांस्कृतिक चेतना पुरुष और स्त्री को दो समान महत्व की शक्तियों के रूप में स्वीकार करती है l वैसे पुरुष समाज के कठोर पौरुष का प्रतीक है, तो नारी उसकी संजीवनी शक्ति l शिव और शक्ति के प्रतीक - नारी और पुरुष संघर्षमय जीवन को समरस बनाते हैं। हम सब प्राचीन काल से ही यह है पंक्तियां पढ़ते और सुनते आए हैं "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। एक नारी रूप में विश्व की संपूर्ण प्रकृति समाविष्ट हो जाती है l स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है - "स्त्रियों की अवस्था में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं, किसी भी पक्षी का एक पंख के सहारे उड़ना नितांत असंभव है l" विद्या, बुद्धि और इन के सहयोग से बल में भी नारी पुरुष के समान ही कार्य कर सकती है l प्राचीन काल में पुरुष की पूर्णता समझी जाने वाली नारी अथवा मध्यकाल में पुरुष की संपत्ति समझी जाने वाली नारी आधुनिक युग में व्यक्ति स्वातंत्र्य के लाभ से लाभान्वित होकर पुरुष दासता से मुक्त स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाली हो गई है। सदियों से ही भारतीय समाज में नारी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उसी के बलबूते पर भारतीय समाज खड़ा है नारी ने भिन्न-भिन्न रूपों में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, चाहे वह सीता हो, झांसी की रानी, इंदिरा गांधी हो या सरोजिनी नायडू l नारी पुरुष जीवन को उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक प्रभावित और निदर्शित  करती रहती है। वह सामान्य पुरुषों की ही नहीं देवताओं की भी जननी है l

डॉ. सोनी, मुजफ्फरपुर