दुनियां सितम से चलती है

न नज़्म से न बज़्म से चलती है,

ये दुनियां तो सितम से चलती है।


ढाये जो जितना सितम उतना खुश रहता है,

ये किस्मत भी उनके ही कदम से चलती है।


हर रिश्ते का जब होता है सौदा अब,

ये मुहब्बत भी पैसों के करम से चलती है।


झूठी कसमों की रिवायत है अब तो,

ये दुनियां न ईमान-ओ-धरम से चलती है।


रोज़ उठते हैं रोज़ ही गिरते हैं,

ये नज़र अब न शरम से चलती है।


                    रीमा सिन्हा

            लखनऊ-उत्तर प्रदेश