"चलो कविताओं में साँसें भरे"

"जो कहना है कह डालो, मन की गगरी से छलकते एहसासों को मन में ही मत भुन डालो, कविताएँ बुला रही है हंसकर शब्दों के मोतियों को पंक्तियों के धागों में पिरो डालो" 

अल्फ़ाज़ों की लडियां पिरो कर पन्नों पर पंक्तियों की महफ़िल सजा ले चलो रच कर कविताओं में कायनात के हर ज़र्रे की रानाइयां भर ले चलो। क्यूँकि कविताएँ ज़िंदा रखती है अहसासों को, कविताएँ ज़िंदा रखती है प्रेम को, कविताएँ ज़िंदा रखती है देशप्रेम को, कविताएँ साँसें भरती है ज़िंदगी में, कविताएँ जीवन देती है कवियों को, कविताएँ पाठकों को ज़िंदगी जीने का तरीका सिखाती है।

कविता दिवस के अवसर पर लेखकों के मनोभाव कल्पनाओं के पर लगाकर पन्नों के आसमान पर रच देते है शब्दों का पूरा संसार। शब्दों का मजमा जब इकट्ठा होता है दिमागी संदूक में और आहट होती है संवेदनाओं के कदमों की तब प्रस्फुटित होती है कविताएँ। कागज़ के गमले में बोइ जाती है फिर धीरे-धीरे उगती है, उगते है पन्नों पर शब्दों के फूल जो हर दिल अज़ीज़ होते है। ये जो कविताएँ होती है ना सुखनवर की आत्मा सी, नवयौवना की हंसी सी, आशिक के एैतबार सी, बच्चों की किलकारी सी, प्रियतमा की लज्जा सी, या विधवा के पीड़ सी, कभी सराबोर छलकती प्याली सी, कभी लहुलुहान खंजर सी हाँ ये कविताएँ तो होती है गरिमा हर कवि के वजूद की। 

करती है सीधे वार पाठकों के दिलों की दीवार पे कभी नीम, तो कभी शहद सी। गर्वित सी फिर भी गुलाम कलम की कभी वेधक तेज़ाबी, राजनीतिज्ञों की दुश्मन तो कभी कोमल पराग सी, महबूब की चहिती इश्क की आग, और चाहत की चिंगारी सी, माहिर हर मतले की करती आ रही है राज कविओं के दिलों पर सदियों से प्यारी सी कविताएँ।

कलयुग की क्षितिज पर बैठे दम तोड़ रहे साहित्य की जिह्वा में प्राण पूरे चलो, पत्ता पीपल का पकने से पहले ही टूटकर शाख से जुदा न हो जाए कहीं। कविताओं का समुन्दर पी ले चलो इर्ष्या की धूप में सूख कर सहरा न हो जाए कहीं, किसी वितरागी मन में स्पंदनों की मेहंदी रचे और,नम आँखों से जुगलबंदी करते जब होंठों पर पड़ी उदासी खिल उठे तब समझ लेना कविताओं ने अपनी बाज़ी जीत ली है।

अस्त हो जाएगा गमगीन सूरज शाम होने से पहले, तारे उग आएंगे रात होने से पहले, पंछी लौट आएंगे शाम होने से पहले, ए कविओं लिखते रहना तुम प्रीत सभर शृंगार रस सजी कविताएँ ताकि मटमैले समय के बीच भी ज़िंदा रहे   हरी डाल पर बैठे पंछियों के बीच प्रेम, और सुलगती रहे जवाँ दिलों के भीतर इश्क की चिंगारियां। मैं भी अपनी यादों की लौ थोड़ी और तेज़ कर दूँगी, मेरे माशूक तुम दौड़े चले आना उस दिन शब्दों के ढ़लते सूरज को साथ मिलकर अर्घ्य देंगे, आओगे न? चलो साथ मिलकर सहज ले विलुप्त होते बिखर रही  कविताओं की परिभाषा को।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगलोर, कर्नाटक)