लोकतांत्रिक दृष्टि से नेतृत्व का अर्थ

नेतृत्व का उद्देश्य लोगों को सही रास्ता बताना है हुकूमत करना नहीं 

वर्तमान परिपेक्ष में नेतृत्व का नाम आते ही राजनीति का पर्याय माना जाता है - सृष्टि में नेतृत्व का मतलब सही राह दिखाना है- एड किशन भावनानी 

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर सृष्टि में मानवीय जीव का मस्तिष्क सोच विचार, अविष्कार, आइडिया का एक ऐसा केंद्र है जिसकी बदौलत वर्तमान डिजिटल युग का उदय हुआ है इस केंद्र में सकारात्मक, नकारात्मक सोच में कैसे शब्दों, स्थितियों, परिस्थितियों के मायने बदल जाते हैं ऐसा हमने अनेक शब्दों में उसका व्यवहारिक अर्थ निकालने में पता चल जाता है कि वह कार्य किस संदर्भ में हो रहा हैं!!! ठीक ऐसे ही कुछ दशकों से नेतृत्व शब्द के उद्देश्य में भी वर्तमान परिपेक्ष में यह नाम आते ही राजनीति का पर्याय माना जाने लगा है जबकि सदियों से हमारे बड़े बुजुर्गों ने इसका मतलब बताया है कि लोगों को सही रास्ता बताना है उनपर हुकूमत करना नहीं!!! 

साथियों बात अगर हम वर्तमान परिपेक्ष की करें तो, अक्सर हम देखते हैं कि कोई सामाजिक संस्था हो या कोई संगठन या कोई कोई राजनीतिक पद, इन सब पर जो भी व्यक्ति मनोनयन, चयन या निर्वाचन द्वारा जब काबिज़ होता हैं तो उसके बाद उसका रुतबा ही बदल जाता हैं उसको ऐसा लगता हैं कि मै तो राजा हूँ और बाकि सब प्रजा। अक्सर पद पाकर व्यक्ति अपने मद में इतना मगरूर हो जाता हैं और अपने नैतिक कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करने में असफल रहता हैं। नतीजन आवाम को फिर से बदलाव की आवश्यक्ता को महसूस करती हैं।

साथियों बात अगर हम नेतृत्व की करें तो इसका मतलब शासन करना, निर्णय लेना, निर्देशन करना आज्ञा देना आदि सब एक कला है, एक कठिन तकनीक है। परन्तु अन्य कलाओं की तरह यह भी एक नैसर्गिक गुण है। प्रत्येक व्यक्ति में यह गुण या कला समान नहीं होती है। उद्योग में व्यक्ति के समायोजन के लिए पर्यवेक्षण, प्रबंध तथा शासन का बहुत महत्व होता है। उद्योग में असंतुलन बहुधा कर्मचारियों के स्वभाव दोष से ही नहीं होता बल्कि गलत और बुद्धिहीन नेतृत्व के कारण भी होता है। प्रबंधक अपने नीचे काम करने वाले कर्मचारियों से अपने निर्देशानुसार ही कार्य करवाता है। जैसा प्रबंधक का व्यवहार होता है, जैसे उसके आदर्श होते हो, कर्मचारी भी वैसा ही व्यवहार निर्धारित करते हैं। इसलिए प्रबंधक का नेतृत्व जैसा होगा, कर्मचारी भी उसी के अनुरूप कार्य करेंगे।

साथियों बात अगर हम नेतृत्व करने किसी पद की गरिमा की करें तो, अगर हमें समाज , संगठन या विधि द्वारा स्थापित कोई भी प्रावधान के अंतर्गत कोई भी पद मिलता हैं तो निश्चय ही यह हमारी खुशनसीबी हैं। मेरे विचार से हमे पद ग्रहण करके अपने स्वभाव में विनम्रता लानी चाहिये, उग्रता नही।हमे किसी भी तरीके से अगर नेतृत्व करने का मौका मिला हैं तो उस सुअवसर का बेहतरीन प्रयोग करते हुए हमें कर्मठ बनकर अपने कार्यकर्ताओं को साथ लेकर अपनी योग्यता को सेवा के माध्यम से परिलक्षित करना चाहिये ताकि अन्य सभी हमारे अच्छे कार्यो का अनुसरण करें। हमे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि नेतृत्व का अर्थ लोगो को सही रास्ता बताना हैं न की हुक़ूमत करना। समय सब को मौका देता हैं, हर बार इतिहास अपने आप को दोहराता हैं जब तक हमे इस सच्चाई का अनुभव होता हैं तब तक वो सुनहरा मौका हमारे हाथ से कोसों दूर निकल चुका होता हैं।

साथियों बात अगर हम प्रबंध जगत में नेतृत्व की करें तो प्रबंध जगत में नेतृत्व का अपना एक विशिष्ट स्थान है एक संस्था की सफलता या असफलता हेतु काफी हद तक नेतृत्व जिम्मेदार होता है कुशल नेतृत्व के अभाव में कोई भी संस्था सफलता के सोपान ओ को पार नहीं कर सकती है यहां तक भी माना जाता है कि कोई भी संस्था तभी सफल हो सकती है जब उसका प्रबंधन ने नेतृत्व भूमिका का सही निर्वहन करता है फिटर एक ट्रकर के शब्दों में प्रबंधक किसी व्यवसायिक उपक्रम का प्रमुख एवं दुर्लभ प्रसाधन है अधिकांश व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के सफल होने का प्रमुख कारण कुशल नेतृत्व ही है। 

साथियों बात अगर हम नेतृत्व के महत्व की करें तो, प्रत्येक समूह के लिए नेतृत्व की आवश्यकता होती है। चाहे वह राजनैतिक हो या सामाजिक, धार्मिक हो या औद्योगिक। कोई भी समूह बिना नेतृत्व के आस्तित्वहीन होता है। परंतु वर्तमान परिपेक्ष में हम अगर राजनीतिक क्षेत्र की बात करें तो अनेकों बार प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में गंभीरता से रेखांकित करते हुए बताया जाता है कि फलाने लोकसभा में, राज्यसभा में, विधानसभा में इतने नेताओं पर इतने केस दर्ज हैं या कोई कारागार में बंद है फिर भी वह नेतृत्व कर रहे हैं। हम अगर अपने आसपास गांव, सिटी, मेट्रो सिटी में नजर दौड़एं तो हमारे आसपास भी हमें कई नामी जीवो नें नेतृत्व का अर्थ ही बदल कर रख दिया है!!! शायद जनता के पास भी कोई मजबूरी ही होगी जो इस बदले हुए नेतृत्व परिभाषा को संयमित होकर स्वीकार कर रहे हैं!!! 

साथियों बात अगर हम नेतृत्व के बदलते परिपेक्ष की करें तो आज सिर्फ राजनीति में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में नेतृत्व की परिभाषा हम बदलते हुए देख रहे हैं क्योंकि आदि अनादि काल से नेतृत्व की कुछ अलग मायना हुआ करती थी जो बुजुर्गों के मुख से हम सुनते आ रहे हैं परंतु वर्तमान में आध्यात्मिक, धार्मिक जैसे क्षेत्रों में भी नेतृत्व की बदलती छवि हमें कुछ सालों में दिख रही है हालांकि नेतृत्व की सदियों पुरानी परंपरा को वापस लौटाने का कार्य हम कुछ वर्षों से देख रहे हैं क्योंकि आज के युग के 56 इंची वाले, बुलडोजर वाले बाबाओं के डर से नेतृत्व की नई परिभाषा से वापस पुरानी परिभाषा में ले जाने की परिस्थितियां पैदा की जा रही है ताकि सभी के बात समझ में आ जाए कि नेतृत्व का उद्देश्य क्यों सेवा करना, सही रास्ता दिखाना है नकि माया का आडंबर अंबार खड़ा करना!!! 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका सटीक विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि लोकतांत्रिक दृष्टि से नेतृत्व का अर्थ क्या है,नेतृत्व का उद्देश्य लोगों को सही रास्ता बताना है हुकूमत करना नहीं वर्तमान परिपेक्ष में नेतृत्व का नाम आते ही राजनीति का पर्याय माना जाता है, सृष्टि में नेतृत्व का मतलब सही राह दिखाना है। 

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुख़दास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र