विश्व शांति

नीरव मन है सजल नयन,

जलते प्राण तन भी विकल,

निर्जन पथ सब अंधकार,

दुस्सह है इसका मूक भार l


कुम्हलाई किरणें डूब रही,

जाने क्यूँ कोयल हूक रही, 

ये कैसा तीक्ष्ण सा है प्रहार,

ज्यों भेद रहा हो आर-पार l


जाने क्यूँ मधुमास आता नहीं, 

पतझड़ विरह ये जाता नहीं, 

विस्मृत हुआ संगीत कहीं, 

कोकिल कंठ भी गाता नहीं l


एकाकीपन का अंधकार, 

कोई सुनता नहीं करते पुकार, 

जीवन निसंग सब व्यर्थ विफल, 

निज स्वार्थों का न कोई पार l


सागर लहरे भी है क्लांत , 

मृतप्राय जीवन श्वासों का भार, 

पीड़ा में स्वयं को कर विलीन, 

डूबा है सारा विश्व-प्रांत l


प्रेम पुष्प से धारा भरे, 

रख धीरज, हम आगे बढ़े, 

विश्व शांति की मशाल ले, 

जीवन पथ को आलोकित करे l


डॉ० सोनी, मुजफ्फरपुर