खालसा

यह "खालसा" लिखा हुआ है, जो अरबी भाषा के शब्द "ख़ालिस" से बना है। अरबी और पंजाबी (गुरुमुखी) दोनों में इसका अर्थ है-- शुद्ध होना, मिलावट-रहित होना, सच्चा होना, निष्ठावान होना, मुक्त होना। इसका सर्वाधिक प्रचलित अर्थ है-- शुद्ध होना।

सिक्ख-परंपरा में इस शब्द का नानक से कोई सम्बन्ध नहीं है। सिक्खी में इसका पहली बार प्रयोग-प्रवर्तन दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने वर्तमान आनंदपुर साहिब में बैसाखी के दिन किया था। तब से सिक्ख-परंपरा में यह "खालसा" शब्द दोनों अर्थों में प्रचलित हो गया-- (१) संपूर्ण सिख-परंपरा के लिए, क्योंकि तब से सिक्खी का दूसरा नाम खालखा-पंथ भी हो गया; और हर व्यक्ति कुछ सुनिश्चित कर्मकांड (जैसे, अमृत छकना आदि) के बाद सिक्ख-पंथ (अथवा मौजूदा अर्थ में "सिक्ख धर्म) में दीक्षित माना जाता है तथा पुरुष को अपने नाम के साथ "सिंह" ( यानी, शेर) और स्त्री को "कौर" (यानी, रानी) लगाने-लिखने का अधिकार मिल जाता है; (२) सिक्खी में दीक्षित लोगों के एक विशेष समूह या वर्ग के लिए, जो युद्धक होते हैं और जिन पर "ज़ालिम के किसी धर्म-जाति की परवाह किये बिना उसके किसी भी तरह के ज़ुल्म से लोगों को बचाना तथा उसके ज़ुल्म व उसकी क्रूरता के ख़िलाफ़ संघर्ष" का दायित्व होता है।

इस "खालसा"-व्यवस्था के बाद से ही सिक्खी में धार्मिकता व आध्यात्मिकता के साथ-ही-साथ भौतिक-शक्ति व सैन्य-जुझारूपन (मिलिटेंसी) का गठजोड़ हुआ, जिसकी परिकल्पना वैसे तो गुरु हरगोबिन्द (छठे गुरु) ने की थी किन्तु जिसे क्रियान्वित किया गोबिन्द सिंह ने।

सिक्खी में पहले "खालसा" अथवा "खालसा" नामक पहले समूह में पांच लोग शामिल थे-- हिम्मत राय, धरम दास, दया राम, मोहकम चंद, साहिब चंद-- ये सभी "पंज प्यारे" कहे गये और पहली बार इन्हीं के नाम में "सिंह" जुड़ा और इनके नाम तब भाई हिम्मत सिंह, भाई धरम सिंह, भाई दया सिंह, भाई मोहकम सिंह, साहिब सिंह हो गये। फिर गुरु महाराज (गोबिन्द सिंह) के आदेश पर इन पंज-प्यारों" ने खुद गुरु महाराज को विधिवत "खालसा" बनाया अथवा "खालसा"-वर्ग में शामिल किया-- तभी से गुरु महाराज "गोबिन्द सिंह" कहलाने लगे, उससे पहले उनका नाम "गोबिन्द राय" था।

चूंकि "खालसा" का नानक से कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिए इसके बारे में उनकी कोई बानी नहीं है। उल्टे इस खालसा-व्यवस्था ने पारंपरिक नानकपंथ में एक नये रोष को जन्म दिया जो सिक्खी में लगभग १८वीं तक जारी रहा। सिक्खी का वर्तमान स्वरूप आज भले ही मुख्यतया "खालसा"-पंथ के तौर पर है-- किन्तु सिक्खी में आज भी पारंपरिक नानकपंथ की इस मान्यता के अनुयायी मौजूद हैं कि सिक्खी का स्वरूप धार्मिक-आध्यात्मिक और सेवाभावी ही होना चाहिए, न कि किसी भी किस्म की मिलिटेंसी की। 

रणभेरी के महान योद्धा सुदेदु  पटेल