ओ दिल छलनी-छलनी हो गया, किसे सुनाऊं दुखड़े !

सब निष्ठुर हो रहे, मन सीमेंट कांक्रीट हो रहे,

रिश्तों में प्यार नहीं, नफरत के बीज बो रहे ,

निर्मल मन पर कलुषित विचार भारी हैं,

आज ये लड़ रहे कल उसकी बारी हैं,

दिल छलनी-छलनी हो रहे यह भी एक बीमारी हैं,

खुदगर्जी ने हमदर्दी को उखाड़ा हैं, ईमानों

पर बेईमान कर रहे सवारी हैं, क्या बखान करूं,

दिल टूट रहा, परिवार की दिवारें दरक गई,

बुढ़े दुखियारों की औलादों पर कोई असर नहीं,

दिल छलनी-छलनी हो रहा, परिवारों में बुढ़ियारों का,

हरियाली देते वृक्ष परिवारों में अब ठूंठ हो गये,

बने हुए घर बिखर रहे, प्रेम नहीं रहा मकान हो गये,

पार्टीशन होकर, अपार्टमेंट में घुसकर फ्लेट हो गये,

जीवित रिश्ते जलभुन कर आमलेट हो गये,

नर्मी कहां मिलेगी जब शीतलता ही खत्म हो गई,

मेनरोड़, फ्लाईओवर, हाईवे में पेड़ों की मौत हो गई,

दुनियां हुई हैं त्रस्त, हो रहा बहुत कष्ट, छाया नहीं

परिवारों में दिल को खोजो पड़ी हुई तकरारों में,

कोमलता नहीं मिलेगी, सिंगल होता परिवार सिर्फ

एक कली खिलेगी, फिर रिश्ते कहां ढूंढने जाओगे,

ये मिलेंगे नहीं बाजारों में, सुरक्षित जीवन के जाइंट

टूट रहे हैं, कोई यहां पड़ा कोई वहां पड़ा टूकड़े-टूकड़े,

ओ दिल छलनी-छलनी हो गया, किसे सुनाऊं दुखड़े !

         - मदन वर्मा " माणिक "

            इंदौर, मध्यप्रदेश