बंसतोत्सव का प्रतीक है राज्य पुष्प बुरांस

प्रकृति का श्रंगार फूलों के बिना अधूरा है वनैले फूलों के राजा बुरांस के फूल का रूप सौन्दर्य जहाँ अतुलनीय है । वहीं इसके औषधिय गुणों से इसकी महता और भी बढ जाती है। हिमाचल प्रदेश के मध्य हिमालयी क्षेत्र में बुरांस के फूलने का समय चैत्र व बैसाख महीना रहता है। इन महीनों में वनों में खिले बुरांस के फूलों का सौदर्य ऐसा प्रतीत होता है ,जैसे प्रकृति ने लाल दुशाला ओढ लिया हो । बुरांस के फूल का वर्ण लाल होता है ।जो पत्तियों के बीच ऐसे सुशोभित होता है, जैसे हरियाली के पटल पर लालियां पोत दी हो । 

भारतीय संस्कृति में पुष्प की महिमा अपरंम्पार है। पुष्प जहाँ ईशोपासना में ईष्ट की सांगोपांग पूजा में अक्षत व गंध तिलक के साथ-साथ अंगों की शोभा में प्रयुक्त होता है ।वहीं पुष्प माल्यार्पण अभिवादन परम्परा में प्रयुक्त होता है ।हिमाचल के अल्पाइन क्षेत्र में जहां ब्रह्मकमल का फूल भूदृश्य को शोभनीय बना देता है । वहीं बुरांस मध्यवर्ती क्षेत्र को अपने रूप से सम्मोहित करता है । बुरांस के फूल का हिमाचल में सांस्कृतिक महत्व रहा है । भारतीय विक्रमी संवत के अनुसार बैसाख महीने को ॠतुराज का राजा कहा जाता है। 

बैसाख महीने में धरती की देह पर हरितिमा और पुष्म पल्लवों से सौदर्य का चिताकर्षक आवरण आच्छादित हो जाता है । बैसाख महीने की संक्रांति का यहाँ चार बङी संक्रांतियों में प्रमुख स्थान है। इस दिन बुरांस ( बुराह ) के फूलों की पंखुड़ियां को मूंज घास से बनी रस्सी में गूँथ कर घर के चारों ओर जनेऊ की शक्ल में बांधा जाता है । घर के द्वार पर भी बुरांस के फूल के साथ सुसज्जित मूंज की रस्सी से सुशोभित किया जाता है ।

हिमाचल के पहाङी परिवेश में मूंज घास को पवित्र माना जाता है मूंज की घास को माता सीता के केश राशि का प्रतिरूप माना जाता है ।हिमाचल में बूढ़ी दीवाली के दूसरे दिन नाग का प्रतिरूप सर्पाकार रस्सा मूंज घास से बनाया जाता है ।मूंज से निर्मित यह रस्सा ( बाण्ड ) कहलाता है। इस दिन नृत्य करते हुए ॠगवेद दानव वृत का प्रतिरूप इस बाण्ड को उठा उठाकर लोग अलाव ( भडराव ) चहुंओर परिक्रमा करते है ।अढाई फेरे भडराणा ( अलाव ) के चारों ओर चक्र लगाकर उसका शिरोच्छेदन किया जाता है ।

बूढ़ी दीवाली पर मूंज का बना नाग वृतासूत्र का प्रतिरूप माना जाता है ।बरहहाल मूंज घास का भारतीय पंरम्परा में सांस्कृतिक महत्व रहा है। बैसाख महीने की संक्रांति में बुरांस को मूंज की रस्सी में बांधकर घरों में बाधने की पंरम्परा इस संक्रांति को प्रमुख स्थान प्रदान करती है ।बैसाख महीने में हिमाचल के सतलुज व यमुना नदी घाटी में बिशू त्योहार की धूम रहती है इस अवसर पर देवता रथारूढ होकर अपनी हारों में नियत स्थान पर बिशू मेले में शामिल होते है ।बिशू मेलों में कौरव व पाण्डवों के वंशज या पक्षधर खूंद महाभारतकालीन धनुर्युद्ध नृत्य ठोडा का अभिनय करते है ,और वहां का वातावरण लोकगीतों व खूंदों की ललकार भरे हुंकार से गुंजित हो उठता है। वास्तव में बुरांस के खिलने के साथ धरती नूतन श्रंगार तो करती है ।

वहीं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष के आरम्भ के महोत्सव की अनुगुंज घर घर सुनाई देती है ब्राह्मण यजमानों के घर जाकर वर्ष फल भविष्यकथन का वृतांत सुनाते है। मंगलमुखी ढोलरू गीतों को घर घर जाकर मंगल गीतों के माध्यम से शुभकामनाएं ज्ञापित करते है ।अतः बुरांस के मनोहारी पुष्पों से धरती की सुषमा आंनदोत्सव का आह्वान करती है। यही कारण है कि हिमाचल की देवभूमि में विराजित देव समुदाय अपने मंदिरों से श्रंगारित होकर निकलकर भक्तों को शुभाशीष प्रदान करते है ।

बुरांस फूल के सांस्कृतिक महत्व के साथ साथ इसका उपयोग शरबत, सब्जी व चटनी बनाने में किया जाता है। नाग च्वासी सिद्ध जी च्वासीगढ़ के कारदार व च्वासी क्षेत्र के युवा समाज सेवी टी सी ठाकुर के अनुसार बुरांस औषधिय गुणों से भरपूर है ।इसका सेवन उच रक्तचाप व मधुमेह जैसे रोगों के निराकरण के लिए उपयोगी माना जाता है। बुरांस के नित्य उपयोग से लीवर के भंयकर रोग से भी मुक्ति मिलती है ।वास्तव में राज्य पुष्प बुरांस की लालित्यकारी आभा और सांस्कृतिक महत्व जीवन में नवचेतना का संचार कर  प्रकृति को विराट सृजन शक्ति के रूप में देखने को बाध्य करता है ।

टी सी ठाकुर 

कारदार च्वासीगढ़ 

करसोग मण्डी हिमाचल प्रदेश