ये मोह-मोह के धागे

जिंदगी बड़ी या छोटी नहीं होती। जिंदगी केवल जिंदगी होती है। उसी तरह दुनिया भर की संतानें अपने माता-पिता को लाख सड़क किनारे छोड़ आएँ, लेकिन वे कभी संतान को दिल से नहीं निकालते। बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए माता-पिता के भीतर चिंता रूपी महासागर में अथाह ज्वार-भाटा का उपद्रव बसता है। बादलों के पीछे बड़ी मुश्किल से एक सूरज छिपा रहता है। किंतु माता-पिता संतान के लिए दुख के बादलों को झेलते हुए असंख्य सुख के सूरजों को निकालने का प्रयास करते हैं। एक जिंदगी खड़ा करने के लिए जिंदगीभर तिल-तिलकर मरते रहते हैं। एक आकार बनाने के लिए खुद निराकार हो जाते हैं। आँखों का तारा, उनका दुलारा, प्राणों से प्यारा, जिंदगी के राजा को विजयी बनाने के लिए जीवन के महायुद्ध में सिपाही सा हँसते हुए प्राणों की बली चढ़ा देते हैं। संतान की इच्छाओं को पूरा करने के लिए खुद की इच्छाओं को तिलांजली देने में तनिक भी हिचकिचाते नहीं हैं।

धागों से कमजोर, खून से भी पतला जहाँ संतान व माता-पिता के संबंध बनते जा रहे हैं, वैसे में संतान की भलाई के लिए शूल भरे जीवन के मार्ग पर हँसते-हँसते चलने वाले माता-पिता धरती को उसके अक्ष पर घूमने पर मजबूर कर रहे हैं। धरती मानो बढ़ रहे वृद्धाश्रमों, विच्छिन्न होते संबंधों, बूढ़ी पड़ चुकी काया को देख अपनी परिक्रमा के दायित्व से हटना चाहती है। उसके पास अब इतनी धरने की क्षमता नहीं कि वह धरती कहला सके। भूख जात-धर्म, भाषा, प्रांत नहीं देखती। भूख तो भूख होती है। फिर चाहे वह किसी भी संतान की हो। माता-पिता इस भूख से लड़ जाने के लिए रोटी को गीता और दाल को अपना ईमान बना लेते हैं। इतिहास साक्षी है जो माता-पिता अपनी संतान के रोटी-दाल के लिए  कभी किसी मजहब की खिल्ली नहीं उड़ायी। किसी प्रांत का परिहास नहीं किया। किसी भाषा को कमतर नहीं आंका। जमाना भूमिहार बनकर माता-पिता के संयम की जमीन को हर बार हड़पने की कोशिश की है, जबकि वही माता-पिता अपनी संतान के लिए जमाने के साहूकारों के सामने खुद को रेहन रखने से पीछे नहीं हटते।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657