हर किसी को नहीं मिलता....

शब्द उड़ते जा रहे हैं। किंतु कब्रगाह की गोद में लेटते बदन, अग्नि को चूमते शरीर वहीं पड़े हैं। न जाने ऐसा क्यों लगता है कि किसी ने मौन को देख लिया है। मौन शरमा रहा है। वह अधनंगा बदन लिए इंसानी पुतलों के बीच इधर-उधर भटक रहा है। अक्षर पूरी तरह से नंगे हो चुके हैं। नंगे शरीर अक्षर बनते जा रहे हैं। उनकी सिसकियाँ सिसक-सिसककर सिमटती जा रही हैं। इनका, उनका, अपना, सबका कोई न कोई कहीं अस्पताल में तो कहीं घऱ के बरामदे में दम तोड़ता नजर आ रहा है। न जाने क्यों जीवन कबीर के पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात कहते हुए एक दिन छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात के दर्शन को बार-बार समझाने का प्रयास कर रहा है। सभी जानते हैं कि जिंदगी दो दिन का मेला है। एक दिन आना और एक दिन जाना है। यदि जिंदगी आने-जाने का नाम है तो जीना किसे कहते हैं?

जिंदगी आईसीयू वार्ड की कमी के चलते नहीं, होते हुए भी दम तोड़ रही है। जिंदगी टीका या दवाइयों की कमी के चलते नहीं, उनकी भरमार होते हुए भी दम तोड़ रही है। जिंदगी डॉक्टरों-नर्सों के चलते नहीं, उनके होते हुए भी दम तोड़ रही है। जिंदगी गैरों की वजह से नही, अपनों के होने बावजूद दम तोड़ रही है। यहाँ किसी चीज़ की कमी नहीं है। कमी है तो अपनों के बीच अपनेपन की। कहने को तो एक जिंदगी दम तोड़ती है, लेकिन वही जिंदगी जीते जी किसी के लिए चुनाव का पुर्जा तो किसी के लिए बारह अंकों वाला आधार कार्ड सा नजर आया। किसी के लिए जमीन जायदाद का मालिक तो किसी के लिए जरूरतें पूरा करने वाला क्रेडिट कार्ड या फिर एटीएम कार्ड सा नजर आया।

शरीर की संरचना आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा जैसी इंद्रियों से होती होगी। लेकिन सच्चाई कुछ और है। न दिखाई देने आने वाली अनगिनत स्वार्थी आँखें, केवल अपने मतलब की चीज़ें सूँघने वाली अनगिनत नाकें, जीते जी किसी को मारकर उसके बदन को चाटने वाली जीभें, किसी की पीड़ा में निकलने वाली कराह में विकृत संगीत का आनंद उठाने वाले कान और दुनिया को भाड़ में झोंककर अपने स्वार्थों को ढकने वाली त्वचाओं के बारे में मानवीय शरीरशास्त्र कभी नहीं बताता। यहाँ हर कोई दिखाने और छिपाने वाली इंद्रियों के साथ घूमता रहता है। काश, कोई होता जो जीवन को निदा फाजली के शब्दों में सचेत करता और कहता कि हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

अब स्वप्न से नींद शून्य होने लगे हैं। नींद में स्वप्नों की भरमार होने लगी है। मरने से पहले सारे के सारे स्वप्न अंधकार की स्याह में डूबकर आत्महत्याएँ करने लगे हैं। सबके बदन में एक मन होता है। वही अमूमन अपना होता है। जो मन अपना होकर दूसरों के बारे में सोचे वही इंसान और जो खुद के बारे में सोचे वही शैतान होता है। हर रात की एक रात होती है। अगर रात की रात न होती तो कितना अच्छा होता। जीवन शब्द बन गूँजता रहता है। विक्षत हृदय का अनुनाद करता रहता है। आँखें खुलने पर जिनके लिए सुबह हुई वे सौभाग्यशाली और जिनके लिए रात ही रात रही वे मृतदेहों के सरकारी आंकड़ों में दर्ज होने के लिए तरसते रहे।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657