नैतिकता का क्रंदन

भारतवर्ष में आजादी के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित किया गया है उसमें संसदीय शासन प्रणाली को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली मानते हुये अंगीकार कर भारतीय संविधान में जगह दी गयी है। यह शासन व्यवस्था  इंग्लैंड के संसदीय व्यवस्था की अनुकृति के रूप में स्वीकृत है। इंग्लैंड में House of Commons का प्रमुख प्रधान मंत्री हो अथवा House of Lords का राजा दोनों ही जनता के साथ आम व्यक्तियों की तरह यात्रा व साहचर्य करते हैं।जितना खर्च विश्व के अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों की सुरक्षा व्यवस्था पर आता है उसकी तुलना में इंग्लैंड सबसे निचले पायदान पर है।

किसी भी राष्ट्र के विकास में उसके नागरिकों की अहम जिम्मेदारी होती है।इंग्लैंड के हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है राष्ट्र को सर्वोपरि रखना और संसदीय परंपरा में पूर्ण आस्था व विश्वास रखते हुये संवैधानिक नियमों का पालन करना।वहां का अलिखित संविधान हमारे संविधान के कई सौ पृष्ठों पर भारी है,कारण है वहां के नागरिकों का मूल्यों के प्रति अटूट विश्वास।

हमारे संविधान निर्माताओं ने लिखित संविधान बनाते समय अन्य देशों से उपबंधों का कर्ज लेकर उसे भारी भरकम तो बना दिया लेकिन वहां के नागरिकों का अनुसरण करने पर बल नहीं दिया।अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया,जर्मनी,जापान,अफ्रीका आदि अनेक देशों के संवैधानिक उपबंधों का सम्मिश्रण है भारतीय संविधान। विश्व के विकसित राष्ट्रों की विकास दर वहां के वे संवैधानिक मूल्य तय करते हैं जिन्हें व्यक्ति अपने नैतिक मूल्यों में समाहित कर मूर्तियों की बजाय सर्वप्रथम राष्ट्र की अर्चना करता है।

हमने कक्षाओं में राजनीतिशास्त्र में प्लेटो से मार्क्स तक पढ़ लिया और उन तमाम देशों के संविधानों को भी परंतु वहां के उन मूल्यों को स्पर्श तक नहीं किया जिन्होंने उस राष्ट्र की सलामी तय की है। हम गुलाम भारत से आजाद भारत तक की यात्रा में यह तय नहीं कर पाये कि संप्रभुता के आलय में वे मूल्य कितने मजबूत हैं जिनके अभाव में वह जनता को सत्ता की मुखापेक्षी बनाकर हर बात के लिये भिक्षुक बना देगी। आज राष्ट्र का हर नागरिक सत्ता और शासन की चौखट पर अपना अस्तित्व तलाशता नजर आ रहा है। भारतीय लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं,यहां गोलियां सिर्फ उन्हें मारी गयी जो अपनी सत्ता सुरक्षित रखने के चलते पहले आतंकियों को पाले और बाद में उनके फुफकारने पर उन्हें सींखचों में बंद करने का प्रयास किये।भिंडरावाले रहे हों या लिट्टे पहले उन्हें पाला पोसा गया और फिर उन्हें औकात में लाने की विफलता ने जहां से रुखसत किया।

वर्तमान समय में देश आतंकवादी हरकतों से मुक्त है अतः प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर हो रहे प्रलाप में नाटक अधिक नजर आता है।माना कि पंजाब सरकार की समझी/नासमझी चूक है लेकिन इस बात पर भी ध्यान होना चाहिये कि आर्थिक रूप से टूटे हुये राष्ट्र के प्रधानमंत्री को 8000 करोड़ के प्लेन और 80 करोड़ की कार की आवश्यकता क्यों पड़ी?मंहगे कपड़े और मंहगी शानोशौकत उस राष्ट्र के मुखिया के लिये अनुकूल नहीं जिसकी पचहत्तर प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा के नीचे है।प्रधानमंत्री का आचरण व वेश वहां की जनता के लिये अनुकरण का विषय होती है।उसके हर उठते कदम में राष्ट्र का संदेश होता है।आखिर हम इतना नीचे क्यों गिरते जा रहे हैं।स्वतंत्र राष्ट्र में हमें इतनी संवैधानिक स्वतंत्रता क्यों दी गई कि हम राष्ट्र व उसके मुखिया को ही गरियाने लगे। दूसरों का लूट ख़सूट कर भगवान को भोग लगाने वाला व्यक्ति जब जयश्रीराम बोलता है तो उस राम पर से भी भरोसा उठने लगता है।

हजारों संतों,महात्माओं,आचार्यों,योगियों,प्रवचनकर्ताओं द्वारा उपदेशित जनता का यह देश निरंतर पतनोन्मुख क्यों है? जितनी चिंता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर है और विभिन्न चैनलों पर कूकुर झौं झौं वाली बहस छिड़ी है,काश! हमारे गिरते मानवीय मूल्यों पर भी उतनी बहस छिड़ी होती तो राष्ट्र का नजारा ही कुछ और होता।मानवीय मूल्यों को यदि नैतिकता के जल से पोषित नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में कोई भी संविधान हमें सुरक्षित नहीं रख पायेगा।

भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर पाश्चात्य संस्कृति को कोसने वाले उन तमाम लोगों से पूछना चाहता हूँ कि वे अपने दिलों पे हाथ रखकर यह बता दें कि क्या आजाद भारत के नये परिवेश में वे सभी सुरक्षित हैं?  यदि नहीं तो वस्त्र,आभूषण व गाड़ियों की नकल मत कीजिये सिर्फ उन देशों के उन मानवीय मूल्यों की नकल कीजिये हुजूर जहां पर मर्यादा पालन उस कर्तव्य बोध की बेदी पर होता है जिस पर धर्मग्रंथों से पहले संविधान पर नैवेद्य अर्पित होता है।जहाँ ईमानदारी,आदर्श,नैतिकता सिर्फ किताबों में दफन नहीं हैं अपितु उस जेहन में जिंदा है जो उन देशों की यात्रा में आपको सड़कों पर ही दिखाई पड़ेंगी।

यहां आजाद,भगत,बिस्मिल,बोस,शास्त्री,भाभा,बिपिन रावत की दुर्घटनाओं पर राष्ट्रीय शोक सत्ता के तपते चूल्हे तथा जांच की आंच में शीघ्र ही भस्मीभूत होता है और प्रधानमंत्री के लिये एक पखवाड़े का अपरिहार्य आपातिक शोक निर्धारित होता है। इस शोक के पीछे उन तमाम शोकों पर भी मंथन की आवश्यकता है जिन्हें हम मानवीय मूल्यों के संरक्षण से बचाते हुये राष्ट्र को नई गरिमा प्रदान कर सकते हैं।


  अंजनीकुमार सिंह

    अवध (उ.प्र.)