लाउडस्पीकर के ‘शोर’ में ‘कराह’ उठे थे अधिकारी

मुरादाबाद। कांठ थाना क्षेत्र के ग्राम अकबरपुर चेंदरी की बात करें तो यहां पर हिंदू-मुस्लिम का आंकड़ा बराबर का है। जुलाई वर्ष 2014 से शायद ही कभी इस गांव में सामुदायिक विवाद हुआ हो। लेकिन, इस बार हालात काफी अलग थे। सूबे में सपा की सरकार थी और मौका था सावन माह का। हिंदुओं की आस्था के इस पर्व पर सपा सरकार ने धार्मिक स्थलों पर लाउड स्पीकर बजाने पर रोक लगा दी थी। इस रोक के बाद दूसरे समुदाय के लोगों ने लाउडस्पीकर बजाने शुरू किए तो हिंदू पक्ष के लोग भी अड़ गए। फिर क्या था लाउडस्पीकर के इस ‘शोर’ की इस जंग में सबसे अधिक अधिकारियों के ‘कराहने’ की आवाज सुनाई दी थी। दरअसल इस पूरे विवाद की वजह लाउडस्पीकर था। रोक के बाद जब हिंदू समुदाय के लोगों ने लाउडस्पीकर बजाया तो दूसरे समुदाय के लोगों ने विरोध किया। इसके बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए थे। विवाद की सूचना मिलने पर पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे और किसी तरह मामले को शांत कराया था। इसके बाद इस पूरे प्रकरण को भाजपाइयों ने अपने हाथ में ले लिया था। पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों पर सत्ता के दबाव में हिंदू समाज का उत्पीड़न करने के आरोप में गांव में महापंचायत का ऐलान कर दिया गया था। मंडल भर से भाजपाइयों को इस महापंचायत में आमंत्रित किया गया था।सात साल के इंतजार के बाद एमपी-एमएलए कोर्ट ने कैबिनेट मंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह व शहर विधायक रितेश गुप्ता समेत 70 आरोपी भाजपाइयों को राहत दे दी है। लंबे समय तक चली सुनवाई में अभियोजन द्वारा 24 गवाह पेश किए गए। इनमें तत्कालीन डीएम चंद्रकांत भी थे। सभी गवाह व आरोपियों से बहस व जिरह के बाद कोर्ट ने 57 पेज के आर्डर में आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। सभी आरोपियों को बरी करने पीछे कोर्ट ने जो तर्क दिया है, उसमें साक्ष्य के अभाव का हवाला दिया है। लाउडस्पीकर के विवाद में हुए बवाल ने स्थानीय स्तर से शासन तक में हड़कंप मचा दिया था। आनन-फानन में भाजपाइयों पर गंभीर धाराओं पर रिपोर्ट दर्ज कर ली गई थी। पुलिस ने तीन माह के अंदर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। 19 अक्टूबर 2014 को पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल कर दिए थे। इसके बाद आरोपियों पर चार्ज फ्रेम करने के लिए लंबी सुनवाई हुई। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने पुलिस पर सत्ता पक्ष के दबाव में भाजपाइयों पर कार्रवाई करने का आरोप लगाया था। करीब साढ़े पांच साल की सुनवाई के बाद नौ जनवरी वर्ष 2020 को सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम हो गया था। इसके बाद अभियोजन की ओर से वादी मुकदमा समेत अन्य गवाहों को बयान दर्ज कराने के लिए पेश किया। इस मामले में अभियोजन ने तत्कालीन जिलाधिकारी समेत करीब 24 गवाह कोर्ट में पेश किए गए। इसके अलावा आरोपियों ने भी बयान दर्ज कराए। इस मामले में अंतिम बार 23 दिसंबर वर्ष 2021 को सुनवाई हुई थी। गवाह और जिरह पूरी होने के बाद कोर्ट ने पहले फैसला सुनाने के लिए 24 दिसंबर फिर चार जनवरी की तारीख नियत की थी। इसके बाद कोर्ट ने फैसला सुनाने के लिए 11 जनवरी की तारीख नियत की। 24 गवाहों के बयान के आधार पर 57 पेज का ऑर्डर तैयार किया गया। इसमे साक्ष्य के अभाव में आरोपियों को बरी करने का हवाला दिया गया। कांठ बवाल के दौरान भाजपाइयों पर पथराव करने के साथ ही रेलवे ट्रैक को बाधित करने का आरोप भी लगा था। इस मामले में कई भाजपाइयों पर जीआरपी थाने में गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। हालांकि इस मामले में भी भाजपाइयों को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उत्तर रेलवे से राहत मिल गई थी। वर्ष 2020 में सुनवाई के बाद कोर्ट ने सभी आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए दोषमुक्त कर दिया था। महापंचायत के दौरान गांव से खदेड़ने के बाद पथराव करने वाले रेलवे ट्रैक पर आ गए थे। इसके बाद सभी ने जमकर पथराव किया था, जिससे ट्रेनों का आवागमन प्रभावित हो गया था। इस मामले में जहां कांठ थाने में मामले दर्ज किए गए थे तो वहीं जीआरपी में मुख्य आरोपी हरमीत सिंह समेत तमाम आरोपी भाजपाइयों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इस मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उत्तर रेलवे की कोर्ट में सुनवाई हुई। वाद-विवेचना के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्ज शीट दाखिल कर दी गई थी। इस मामले में कोर्ट ने सात जुलाई वर्ष 2020 को फैसला सुनाते हुए गवाहों के बयान और साक्ष्यों के आधार पर सभी आरोपियों को क्लीनचिट देते हुए बरी कर दिया था।