जन लेखक और सरकारी लेखक

कुछ कलम पकड़ने वाले होते हैं, तो कुछ कलम से लिखने वाले। लिखने वाले हमेशा पर्दे के पीछे रहते हैं और पकड़ने वाले पर्दे के आगे। दुनिया की समझ रखने वाले भली भांति जानते हैं कि पर्दे के आगे रहने वाले पर्दे के पीछे रहने वालों पर हमेशा भारी पड़ते हैं। ये लोग लिखने से ज्यादा मिलने जुलने, सांठ-गांठ करने, मक्खन लगाने, चने के झाड़ पर चढ़ाने में सिद्धहस्त होते हैं। ऐसे लेखक गिरगिट के बाप होते हैं। ये जितनी तेजी से रंग बदलते हैं उतनी तेजी से गिरगिटों की सात पुश्तें भी नहीं बदल पातीं। यही कारण है कि अध्यक्षता, मुख्य अतिथि से लेकर सम्मान पाने वलों तक में इनका नंबर अव्वल रहता है। दूसरे नंबर पर आना तो इन्हें कतई पसंद ही नहीं होता। दूसरी ओर बेचारे पर्दे के पीछे अपनी सृजनात्मक का लोहा मनवाने के चक्कर में खुद जंग खाते लेखकों का कहना ही क्या। इनकी कद्र न घर में होती है और न बाहर।

पर्दे के आगे रहने वाले लेखक भी कई प्रकार के होते हैं। कोई सनसनीखेज तो कोई बाल की खाल निकालने वाला। कोई फूहड़ता के नाम पर रुपयों का अंबार लगाने वाला तो कोई सरकार के दरबार में चाटुकारिता का तलुवा चाटने वाला। कोई श्रृंगार के नाम पर भंगार को भी शर्मसार करने वाला तो कोई किसी की समझ में न आने वाली उटपटांग लिखने वाला। सब अपने-अपने क्षेत्र के 360 डिग्री सिरघुमाऊ लेखक हैं। उल्लू महाराज भी इन्हीं की शागिर्दगी करते हैं। मोटे तौर पर इन सभी लेखकों को दो ही वर्ग में बांटा जा सकता है- एक सरकार की गंदगी सूँघने, चाटने, खाने और बात बात पर वाहवाही करने वाले तो दूसरे जनता की आँखों का नूर और उनका सिरमौर बनकर रहने वाले।

सरकारी लेखक और जन लेखक में केवल एक महीन से पर्दे का अंतर होता है। नीयत बदलते ही यह पर्दा कभी भी तार-तार हो सकता है। जन सामान्य की खस्ताहाल जिंदगी के बारे में जन लेखक जितनी अच्छी तरह से बता सकता है उतने ही करीने से बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतों के बारे में सरकारी लेखक बता सकता है। जन लेखक के लिए पाठशाला और अस्पताल बहुत जरूरी लगता है तो सरकारी कवि के लिए मधुशाला, ड्रग्स, नशाखोरी जिंदा रखने के लिए ऑक्सीजन सा लगता है। जनलेखक जिंदगी भर स्वच्छ, शुभ्र और दोषरहित समाज के निर्माण के लिए चिंतित रहता है तो सरकारी लेखक भ्रष्टाचार, बलात्कार, शोषण आदि विसंगतियों में भी सरकार की खूबियाँ ढूँढ़ निकालता है।  सच तो यह है कि इन दो के बीच सामान्य उलझा हुआ है। और जब तक वह उलझा हुआ है यह दुनिया इसी तरह झुकाव के साथ चलती रहेगी। वह अपने अक्ष से कितनी झुकी है यह सामान्य ज्ञान का प्रश्न है, लेकिन इन लेखकों के चलते और कितना झुक रही है यह गूढ़ रहस्य का प्रश्न है।   


डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657