इश्क की इंतहा

प्यार हो ही जाता हैं गर हो जुत्सजू

जब इश्क हो ही जाता हैं रूबरू

जब हो जानिब वफा–ए–यार

क्यों न हो दीदार–ए–यार

ये  तो वो मर्ज हैं यारों

जो हैं ला– इलाज

ज्यूं ज्यूँ खाओ दवाई

बढ़ता जाता हैं मर्ज– ए–इश्क

लाइलाज मर्ज को न जरूरत हैं

तावीज और हकीम की

इसकी तो तासीर हैं वफा

दीदार–ए– यार ही काफी हैं

इश्क की इंतहा के लिए


जयश्री बिरमी

अहमदाबाद