सौगात

कांटो पर हम चले,

त्याग समर्पण के साथ, 

फूल बिछाते चले राहों में, 

पर लगे दर्द ही अपने हाथ, 

ये कैसी सौगात! 


खुशियां बांटते हम चले,

जो थे मेरे पास, 

पर खाली हाथ ही हम रहें, 

ये कैसी सौगात! 


त्याग ही करते रहें, 

कुचलते रहे अपने अरमान, 

पर दुनिया की इस भीड़ में, 

न प्रेम मिला न कोई मान। 


चाह थी मेरी अपनी,

कुछ ख्वाहिशें भी रहीं, 

कोई न अपना हुआ जहां में, 

मेरी माँ ही अपनी रही। 


दर्द कांटों का सहे, 

पर दर्द का कोई गम नहीं, 

पत्थरों को झेल रहे, 

चोट की परवाह नहीं, 

ताकत जो है मेरे पास, 

वो दुआ है मेरी मां की, 

अब तूफानों की क्या औकात, 

माँ की दुआ ही मेरी सौगात। 


स्वरचित अनामिका मिश्रा

झारखंड जमशेदपुर