ये ज़िन्दगी..


                       

ये ज़िन्दगी..

ये ज़िन्दगी है रंग बिरंगी..

क्या क्या रंग है दिखलाती.!!

कहीं खुशियों के मेले हैं

तो कहीं दुखों के रेले हैं

कहीं शहनाई बज रही..

किसी की बरात की

तो कहीं किसी की अर्थी है उठ रही..!!

कहीं दुल्हन सजी है लाल जोड़ें में..

तो कहीं किसी की देह लिपटी है

सफेद कफ़न में..!!

ये ज़िन्दगी है रंगबिरंगी…

क्या क्या रंग है दिखलाती..!!

कहीं बारिश के मौसम में

लोग मस्ती हैं कर रहे.

कहीं दावतें हैं उड़ रही..

और कुत्ते भी बिस्कुट हैं खा रहे..!!

और कहीं किसी गरीब का आज

चूल्हा भी नही जला..

क्योंकि बारिश में उसको

काम नही मिला..!!

ये ज़िन्दगी है रंग बिरंगी..

क्या क्या रंग है दिखलाती..!!

हाड़ तोड़ती बर्फीली ठंड में

बड़े बड़े  बंगलों में

किसी को मखमली बिस्तर

पर भी नीँद नहीँ आती..

और कहीं चीथड़ों में लिपटा

कोई गरीब टाट के  बिस्तर पर

खुले मे ही थक के चूर हो कर

सो गया है..

ये ज़िन्दगी है रंग बिरंगी..

क्या क्या रंग है दिखलाती..!!

मौलिक रचना

रीटा मक्कड़

लुधियाना