बेदर्द बुढ़ापा

जब अपनों का साथ छूटे।

जीवन के सब सपने टूटे।।

समझो बेदर्द बुढ़ापा आया है।

मुरझा गई सारी काया है।।


नींव रखी थी जिस घर की,

आज मिला नहीं एक कोना।

  मैं छत था जिससे गृह की,

खुले गगन तले अब सोना।।


उँगली थाम के चलना सिखाया।

आज उसी ने घर से भगाया।

खून पसीने से जिसको सींचा।

बुढ़ापे में उसी ने दिखाया नीचा।।


पूरी नींद न पाए थे नैना ।

जागे थे जो वासर रैना।।

था कभी मैं प्यारा सा पापा।

आ गया देखो बेदर्द बुढ़ापा।।


गीता देवी

औरैया उत्तर प्रदेश