हार क्यों मान ली जाए?

बुरे से बुरा क्या हो सकता है

हमारे साथ?

यही कि हमारी धन - संपत्ति

हमारे हाथ से चली जाए,

नौबत आ पड़े पेट पालने वाला

काम धंधा बंद करने की,

सामाजिक मान - मर्यादा पर

लग जाए कोई बट्टा,

या फिर अरमान कोई प्यारा

टूटकर बिखर जाए,

सफर का साथी राह कर ले

अपनी हमसे अलग

या फिर धोखेबाज कोई

जिंदगी में टकरा जाए,

ज्यादा से ज्यादा बुरा क्या होगा?

यही कि हमारी अथवा हमारे किसी

प्रियजन की जान चली जाए,

लेकिन अभी हमारी जान

गई तो नहीं है

परेशानियां बड़ी हैं माना लेकिन

वो इंसान के लिए नई तो नहीं हैं,

रात अंधेरी है बहुत लेकिन अब तक 

वो उजाले पर विजयी तो नहीं है,

तो उठ!

हो खड़े संघर्ष की राह पर बढ़ा कदम,

राख से कर तिलक अपना

और नियति का दे तोड़ भ्रम,

कि हार मानना है मौत

इंसान के हौसले, इरादों एवं

जीवन शक्ति की,

जब तक है सांस तब तक है आस

फिर जिंदा होकर खुद को 

मुर्दा क्यों मान लिया जाए?


                                जितेन्द्र 'कबीर'