लेखन प्रतिभाओं के लिए मंच

दुनिया में भारत संभवत: एकमात्र ऐसा देश हैं, जहां इतनी सारी बोली-भाषाएं जीवंत हैं और जहां सौ से अधिक भाषाओं व बोलियों में प्रकाशन होता है. भारत पुस्तकों का तीसरा सबसे बड़ा प्रकाशक देश भी है. इसके बावजूद हमारे देश में लेखन को एक व्यवसाय के रूप में अपनानेवालों की संख्या बहुत कम है. बमुश्किल ऐसे युवा या बच्चे मिलते हैं, जो आगे चलकर लेखक बनना चाहते हैं. पत्रकार बनने की अभिलाषा तो बहुत मिलती है, लेकिन एक लेखक के रूप में देश के ‘ज्ञान-भागीदार’ होने की उत्कंठा कहीं उभरती दिखती नहीं. कभी-कभी नये सिद्धांत और विचार सहज ही अपना स्थान निर्मित करते हैं और मूक क्रांति के उत्प्रेरक बन जाते हैं। कुछ ऐसा ही नयी पीढ़ी के लेखकों को खोजने, पहचानने और बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप शुरू की गयी प्रधानमंत्री मेंटरशिप युवा योजना ने हासिल किया है. एक लंबी और पारदर्शी प्रक्रिया के बाद पचहत्तर ऐसे युवा लेखक चुने गये हैं, जो जल्द ही देश के ख्यात लेखकों के सानिध्य में स्वतंत्रता से जुड़े किसी अनछुए पहलू पर किताब तैयार करेंगे. उनके शोध, लेखन श्रम, यात्रा आदि के लिए पचास हजार रूपये मासिक वजीफा दिया जायेगा। शिक्षा मंत्रालय द्वारा ‘भारत के राष्ट्रीय आंदोलन’ विषय पर 22 आधिकारिक भाषाओं और अंग्रेजी में पुस्तक प्रस्तावों को आमंत्रित करते हुए अखिल भारतीय प्रतियोगिता के माध्यम से शुरू हुई इस योजना को अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली, जिसमें कार्यान्वयन एजेंसी की भूमिका राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने निभायी. इन 23 भाषाओं में कथा और कथेतर साहित्य की श्रेणियों में राष्ट्रीय आंदोलन, गुमनाम योद्धाओं, अज्ञात स्थानों की भूमिका, महिला नेताओं आदि पर 16000 से भी अधिक पुस्तक प्रस्ताव प्राप्त हुए. अब इन 75 लेखकों के परिणाम घोषित हो रहे हैं और इन पुस्तकों को तैयार करने की विकास यात्रा शुरू हो गयी है। ऐसी चुनौतीपूर्ण अखिल भारतीय प्रतियोगिता के लिए आमंत्रित 5000 शब्दों में सारांश और अध्याय योजना के पुस्तक प्रस्ताव की प्रस्तुति अपने-आप में अनूठी पहल है, जो सोचने, पढ़ने, लिखने और राष्ट्र नायकों तथा उनके योगदान के बारे में लिखने और जानने के विचार को उच्च प्राथमिकता देने पर भी प्रकाश डालती है. प्रधानमंत्री मेंटरशिप युवा योजना एक महत्वपूर्ण मंच प्रतीत होता है, जो न केवल युवा लेखकों को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि यह समग्र रूप से देश के संकटमय अनुभव और समस्याओं के दस्तावेजीकरण और सीखने के विचार को बढ़ावा दे रहा है, जब देश ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दमनकारी शासन से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। युवा लेखकों में कुछ की आयु 15 वर्ष से भी कम है, इसलिए इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं. एक मुख्य तथ्य यह सामने आया है कि अंतिम सूची स्वाभाविक तौर पर लैंगिक समानता हासिल करने में सक्षम रही है. इसमें 38 पुरुष और 37 महिलाओं के नाम हैं. इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि वर्षों से बालिकाओं के लिए बड़े पैमाने पर शैक्षिक और सशक्तीकरण कार्यक्रम अपना प्रभाव डालने में सक्षम है.

साहित्य कैसे एक उपकरण बन सकता है, देश को सांस्कृतिक और साहित्यिक समझ और एकीकरण के सूत्र में बांध सकता है, इसका अच्छा उदाहरण तब मिलेगा, जब विभिन्न भाषायी पृष्ठभूमि और परंपराओं के युवा लेखक राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न ज्ञात और अज्ञात तथ्यों को एकत्र कर अपनी पुस्तकों के माध्यम से एक साथ आगे आयेंगे. राष्ट्रीय लेखक मेंटरशिप योजना सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के लेखकों को मंच प्रदान करने के साथ संभावित लेखकों को देश के बहुभाषी ताने-बाने में मूल्यवान अंतदृष्टि प्रदान करने का वादा करती है. यह एक ऐसी अंतर्दृष्टि है, जो किसी विशेष भाषा से संबंधित लेखक के लिए बातचीत का सरल एवं विस्तृत मंच उपलब्ध कराती है। युवा लेखकों में बहुभाषी समझ और दृष्टिकोण विकसित करने से वे भारत की विविधता को बेहतर तरीके से जान सकते हैं और उनका बहुआयामी दृष्टिकोण देश की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के विकास में भी सहयोगी बन सकता है. यह प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को भी आगे बढ़ायेगा. चूंकि प्रधानमंत्री युवा योजना के अंतर्गत प्रकाशित पुस्तकों का बाद में भारत की अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जायेगा, इसलिए यह राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के आदर्श वाक्य ‘एकः सूते सकलम्’ के अनुरूप होगा। एक बार प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘यदि 21वीं सदी ज्ञान और ज्ञानवान मानव-शक्ति का युग है, तो हमें इस शक्ति की सराहना के लिए पुस्तकों के साथ मजबूत संबंध स्थापित करना होगा.’ राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के लिए सौभाग्य की बात है कि आजादी की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत न्यास को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना को ध्यान में रखते हुए अग्रणी और विचारशील युवाओं को विकसित करने का कार्य सौंपा गया है. आशा है कि कुछ चयनित लेखक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के अमर वचनों को साकार करने के लिए अपनी छाप छोड़ेंगे- ‘जहां मन निर्भय हो, और मस्तक गर्व से ऊंचा हो, जहां ज्ञान सहज ही प्राप्त हो, जहां विश्व को बांटा न गया हो, संकीर्ण दीवारों से ध् जहां शब्द निकलते हों, सत्य की गहराइयों से ध् जहां बिना थके कार्यशील बांहें, उठती हों निर्माण की ऊंचाइयां छूने...