“बचा रहे थोड़ा थोड़ा “

ना हो पूरी हर उम्मीद 

बची रहे थोड़ी 

तो बनी रहेगी जीने की ख्वाहिश 

कभी जीवन के उस मोड़ पर खड़े हो 

की आगे बची नही कोई इच्छा 

तो किस कर्म में दिशा होगी 

कुछ भी बची एक तिनके जैसी 

बचे मन में किसी की सेवा ,

प्यार ,समर्पण 

मानवता प्रसार 

भक्ति मोक्ष 

प्रेम से उपजी 

ईश्वर दर्शन अभिलाषा 

या फिर जीवन रहस्य

या प्रकृति का 

रूप 

हाँ कुछ भी 

बची रहे जैसे बाती में तेल 

की बूँद 

वही भरेगी प्राणों में स्पंदन 

और निर्थक ठहराव को 

गति देगी सार्थकता के साथ 


सवि शर्मा 

देहरादून