उछल रही उम्मीदें

देना नहीं दिल तुम

यूं किसी को मचलकर 

उतरा है गांव मेरे

चांद खुद से चलकर 


छाई फ़िजा में ऐसी मदहोशी 

बिखरने लगी है खुशबू 

मेरी चाहत को मिली राहत 

खत्म हुई जुस्तजू 

ख्वाहिशों को रखे हैं दबाकर 

बढ़ने लगे पांव मेरे 

खामोशी से संभलकर 

उतरा है गांव मेरे

चांद खुद से चलकर 


उछल रही उम्मीदें 

छलक रहे पैमाने 

किस्मत कैसे लेती करवट 

बेकरार है दीवाने 

चाहता बसाना धड़कनों में 

घुली रहे वो मेरी सांसो में 

महसूस करता रहूंगा उसे 

मैं अपने एहसासों में 

कब होंगे हम इक

वक्त से पिघलकर 

देना नहीं दिल तुम 

यूं किसी को मचलकर 


जी रहा था अब तलक 

सिर्फ ख्वाबों के सहारे 

फंसकर इश्क के जाल में 

मैंने दिन कैसे गुजारे 

बेकरारी से बढ़ी थी बेचैनियां 

जुबां पे रही मेरी कहानियां 

उबरा कब मैं झंझावातों से 

इक नए सांचे में ढलकर 

देना नहीं दिल तुम 

यूं किसी को मचलकर 


देना नहीं दिल तुम 

यूं किसी को मचलकर 

उतरा है गांव मेरे 

चांद खुद से चलकर


राजेंद्र कुमार सिंह

ईमेल: rajendrakumarsingh4@gmail.com