दल और दलदल

इधर कुछ दिन पहले प्रधानी के चुनाव के बारे में समाचार पत्रों में खबर छपी। मैं इस खबर से बड़ा खुश था। सोचा हमारी कुत्तागिरी और चाटुकारिता को कोई न कोई दल अवश्य रेखांकित करेगा और हमें टिकट देगा। सच तो यह है कि दल के एवचन रूप का बहुवचन रूप बनता है तो हमारे जैसों के लिए दलदल हो जाता है। इन दलदलों से धंसकर निकलने के लिए मैंने बहुत पापड़ बेले। पापड़ बेलते-बेलते मेरी पपड़ी निकल गई। फिर सोचने लगा यह तो पार्टी का टिकट है न कि कोई बीमारी का, जो खुद ब खुद चल कर मेरे पास आएगी। सो मैंने निर्णय किया कि मैं ही चलकर फलाना-फलाना पार्टी कार्यालय से टिकट ले लेता हूं। टिकट बांटने वाले माहौल में एक बार के लिए भगवान के दर्शन हो सकते हैं लेकिन पार्टी अध्यक्ष के नहीं। कई नई चप्पलों को घिसवाकर या यूं कहें कि शहीद करवाकर पार्टी अध्यक्ष से भेंट की। पार्टी अध्यक्ष ने मुझे फट से पहचान लिया और कई सारे उम्मीदवारी के इच्छार्थियों के साथ-साथ मुझे भी एक आवेदन पत्र दे दिया। आवेदन पत्र में नाम, पता, पढ़ाई, अनुभव तथा संपर्क के बारे में पूछा गया था। मैंने बिना देरी किए आवेदन पत्र भरकर पार्टी अध्यक्ष को दे दिया। उनसे पूछा कि मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरी उम्मीदवारी पक्की हुई या नहीं। अध्यक्ष ने धूर्त मुस्कान पेंकते हुए कहा - तुम्हें छोड़कर कोई दूसरे उम्मीदवार का नाम सुनाई देने लगे तो समझ जाना कि तुम्हारा आवेदन पत्र कूड़ेदान में फेंक दिया गया है।

मेरा आवेदन पत्र कूड़ेदान की बाहों में सजा दिया गया। मुझसे रहा नहीं गया। मैं दौड़े-दौड़े पार्टी कार्यालय पहुंचा। वहां अध्यक्ष से मिलने की लाख कोशिश की, लेकिन परिणाम जीरो बटा लूल था। मेरी छटपटाहट को देख वहां का चपरासी मुझसे कहने लगा आपका आवेदन तो पहले ही दिन कूड़े की भेंट चढ़ चुका था। भला कोई आवेदन में बेफिजूल की योग्यताएं लिखता है? आपका आवेदन आपकी विशेष योग्यताओं की वजह से तिरस्कृत हुआ है। उम्मीदवारी के लिए कई सारे पुलिस केस जैसे बलात्कार, हत्या, चोरी-फिरौती आदि दर्ज होने चाहिए थे, जो कि आपके पास बिल्कुल नहीं है। जेल जाने का अनुभव तो छोड़ो जेल के बारे में आपने सुना तक नहीं है। ऊपर से सेवा करने का भूत अलग से। कोई नेता भला जनता की सेवा करता है? और यह जो चौबीसों घंटों जनता के बीच रहने की खुजली है, यह किसी दिन आपको ले डूबेगी। जनता शिकायत करे उससे पहले आप उसकी चौखट पर पहुँच जाते हैं। हमें समस्या का निवारण करने वाले नहीं समस्या खड़ी करने वाले उम्मीदवार की जरूरत है। सौ बात की एक बात, हमें सीधे नहीं टेढ़ों की जरूरत थी। जो कि आप इस मामले में सबसे फिसड्डी साबित हुए हैं। इसलिए महाशय बाहर का रास्ता नापिए और टिकट का ख्याल छोड़ दीजिए।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657