भोर-भिनसार

भोर भिनसार शोर नित्य चहुँओर

कलरव निकुंज-खग निशा कंठ

उड़ फुर्र चाह उर-नभ वेग-तेग

भोर-भोर कजरारे अलसाये नैन।

अँगड़ाई अलसाई अंग-अंग मोरनि

प्रातः उच्छ्वास जैसे झंझावात

मृदु मुस्कान जैसे छवि कंजकली

दृष्टि भोरी चंचल जैसे गोवत्स।

मन कोमल-अमल भाव निर्मल

विवेक एक नेक हित समरूप

मृदु बोल-तौल-मोल हित जान

कमी न, कमाई गुण जान न रूपं

निशा खैरवा