'त्रिविध पावन पर्व' और तथागत'

तथागत बुद्ध के जीवन के साथ वैशाख पूर्णिमा के दिन तीन प्रमुख घटनाऐं जुड़ी हैं:-

1: सिद्धार्थ के रुप में उनका जन्म।

2: बुद्धत्व प्राप्ति।

3: महापरिनिर्वाण की प्राप्ति।

संसार में इस प्रकार की तीन पवित्र घटनाऐं किसी भी अन्य महापुरूष के साथ नहीं घटी हैं। इन तीन घटनाओं के कारण आज के दिन को “त्रिविध पावन पर्व” कहते है। 

डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना लिखित 'तथागत' में इन तीनों घटनाओं का सजीव चित्रण किया है। 'तथागत' हिंदी प्रबंधकाव्य नौ सर्गों में विभक्त है। द्वितीय सर्ग में सिद्धार्थ का जन्म, पंचम सर्ग में बुद्धत्व की प्राप्ति और अष्टम सर्ग में महापरिनिर्वाण की प्राप्ति का काव्यतम वर्णन है। 

आनन्द श्रीकृष्ण लिखते है-"महामाया के गर्भ से ई.पू. 563 में वैशाख पूर्णिमा के दिन शाल वृक्षों से आच्छादित लुंबिनी वन में गौतम बुद्ध का जन्म हुआ। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ गौतम था।" ( सिद्धार्थ से बुद्ध, पृष्ठ 13)

डॉ मस्ताना ने द्वितीय सर्ग में इस बहुत सहज शब्दों में इसे उल्लेखित किया है-

"ईसा पूर्व पाँच सौ तीरसठ का था वर्ष महान

 दिन वैशाख पूर्णिमा को आया प्राणों का प्राण

दिव्य रुप औ' रंग अलौकिक, ज्यों पूनम का चान 

हुआ अवतरण जिसका वो था, ज्योति पुंज दिनमान।"

सामाजिक चितंक व वरिष्ठ पत्रकार श्री सत्येंद्र पी एस लिखते हैं कि 'बुद्ध के जन्म के समय उनके परिवार, राज दरबार में आई खुशियों का काव्यात्मक वर्णन बौद्ध ग्रन्थों में दी गई जानकारी के मुताबिक ही है और कवि ने पूरी निष्ठा से प्रयास किया है कि काव्य रूप देने में ऐतिहासिकता से छेड़छाड़ न होने पाए।'

श्रीनिवास सिंह 'श्रमणों के दो शिरोमणि: भगवान महावीर एवं भगवान बुद्ध' नामक पुस्तक में लिखते हैं-

"यह वैशाख पूर्णिमा का दिन था। यह 'सुजाता' के दिव्य पायस का प्रभाव था। यह 'श्रोत्रिय' द्वारा दिये गये तृणासन का प्रभाव था। यह दिव्य 'बोधि-वृक्ष' के संसर्ग का प्रभाव था। यह वैशाख पूर्णिमा की 'चन्द्र-ज्योत्सना' का प्रभाव था। यह वज्रासन के नीचे के 'स्थान' का प्रताप था। यह सिद्धार्थ द्वारा उस दिन लिये गये 'संकल्प' का प्रताप था। केवल एक रात्रि में प्रातः काल के पहले सिद्धार्थ अर्थात शुद्धोदन के 'गौतम' ने 'बुद्धत्व' प्राप्त कर लिया।"(पृष्ठ 84, पिलग्रिम्स पब्लिशिंग)

'बुद्ध और बौद्ध साधक' में भरत सिंह उपाध्याय लिखते है कि 'भगवान बुद्ध ने बोधिसत्व होने की अवस्था में, अर्थात जिस समय के सम्यक ज्ञान की खोज कर ही रहे थे,  मनुष्य जीवन के उन सब आरोह-अवरोहों, विचिकित्सकों, भयों और विषमताओं को अनुभव किया था जो एक सत्य-गवेषक को कभी भी अनुभव करनी पड़ती है।' (सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली)

आनंद एस कृष्णा 'The Buddha; The Essence of Dhamma and its Krishna' में वैशाख का महत्व बतलाते लिखते हैं-

"On the full moon day of the month of Vesakha (April-May), after having refreshed himself in the Neranjara river, Siddhattha arrived at an inviting grove of trees. There he sat down under pipal tree with a determination (Adhitthana) not to leave his a spot seat before attaining Enlightenment. "Let my skin and sinews and bones dry up, together with all the flesh and blood of my body! I will welcome it! But I will not move from this s until I have attained the supreme and final wisdom. (Page-36, Samrudh Bharat publication, Mumbai)

'तथागत' के पंचम सर्ग में सिद्धार्थ को मिले बुद्धत्व को डॉ मस्ताना प्रांजल शब्दों में  काव्यतम अभिव्यक्ति देते हुए लिखते है-

"था वैशाख पूर्णिमा का दिन, पल क्षण था अतिपावन 

एक नया इतिहास बनाने का प्रण लिए सुपावन

 चौथा पहर बुद्ध ने दुख का सत्य किया अवलोकन

 आर्य सत्य का दर्शन कर हर्षित थे उनके लोचन।

प्रभु को अब अनुमान हो गया जीवन सत्य यही है 

अगर कहीं है स्वर्ग, स्वर्ग से सुन्दर धरा यहीं है 

हुए बुद्ध दैदीप्यरुप दिनमान सरिस आलोकित 

कपाल पर था भविष्य का सुन्दरतम भविष्य अंकित।

सात वर्ष की सफल साधना का प्रतिफल था शुद्ध 

पैंतीस वर्ष उम्र थी केवल, गौतम हो गये बुद्ध 

दिव्य तेज पा अनत शक्तियाँ हर्षित हुए तथागत 

उनकी अमृत वाणी का हर युग शुभ स्वागत।

बोले प्रभुवर चित्त हुआ, सुसंस्कार से युक्त 

जनम जनम के फेरों से मैं आज हो गया मुक्त

तृष्णाओं का अंत हो गया, मोह मिट गये सारे 

तमस मिटा दुविधा का, प्रज्ञा के फैले उजियारे।"

(पृष्ठ -75)

बाबासाहेब अंबेडकर ने 'भगवान बुद्ध और उनका धम्म' नामक पुस्तक में लिखा है कि ज्ञान प्राप्ति के पूर्व गौतम एक बोधिसत्व थे। सम्बोधि  प्राप्ति के बाद ही वह बुद्ध बने।' (खण्ड 1 भाग 4/113)

'तथागत' का प्रणयन अंधकार से प्रकाश और तमस स्व ज्योति की ओर जाना है। जैसा कि डॉ मस्ताना लिखते है कि एक साधारण सा लगने वाला मानव आश्चर्यजनक रूप से कितना महामानव है, यही प्रस्तुत करना मेरा उद्देश्य है। प्रथम सर्ग में इसे स्पष्ट कर दिया गया है-

"मेरा एक उद्देश्य जगत अमिताभ प्रभु को जाने

पहले से भी अधिक आस्था के सँग उनको माने 

प्रकृति के इस महापुरुष को अन्तर से पहचाने 

चलें कृपा से उनकी अपना जीवन और सजा लें।

वैसे तो पूर्वजों ने गौतम का गुण अतिशय गाया 

अपने लेखों, आलेखों, कविता का विषय बनाया ।

बुद्ध भक्ति से ओत प्रोत मन मेरा जब हर्षाया 

मैने स्वयं सिद्धार्थ के, पावन चरणों में पाया।" 

(पृष्ठ 1)

वैशाख पूर्णिमा का तीसरा महत्व 

बाबा साहेब 'भगवान बुद्ध और उनका धम्म' में लिखते हैं कि महापरिनिर्वाण के पूर्व भगवान बुद्ध ने आनंद से कहा- "आनंद! हो सकता है कि तुम ऐसा कहो, कि अब हमारे शास्ता नहीं रहे। अब उनका * उपदेश नहीं हो पाएगा। लेकिन आनंद! तुम्हें ऐसा नहीं समझना चाहिए। जो कुछ मैंने विनय और अनुशासन सिखाया है, मेरे बाद वही तुम्हारे शास्ता होंगे।(खण्ड 7, भाग 3/453)

तथागत के अष्टम सर्ग डॉ. मस्ताना ने परिनिर्वाण की मार्मिक अभिव्यक्ति की है उनकी पंक्तियों को पढ़ने से पहले पॉल कारुस की लिखी इन पंक्तियों को पढ़ना चाहिए -

"जब भगवत ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया, तब एक भयानक और भीषण भूकंप से पृथ्वी कांप उठी। स्वर्ग से उल्कापात हुआ। और वे भिक्षु, जो विकारों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए थे, हाथ उठाकर विलाप करने लगे और उनमें से कुछ यह सोच कर पृथ्वी पर पछाड़ खाकर गिर गए कि भगवत जल्दी ही मर गए। बहुत जल्दी ही वह अस्तित्व को छोड़ गए। बहुत जल्दी ही संसार का प्रदीप बुझ गया।" (बुद्ध गाथा, पॉल कारुस, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली, पृष्ठ 183)

दूर कहीं श्वानों का रोना, गौओं का रंभाना 

था संकेत जगत से किसी महामानव का जाना।

प्रहर तीसरा धीरे धीरे और निकटतम आया 

क्षण यह परिनिर्वाण का वायु ने संदेश सुनाया।

लिए दाहिनी करवट गौतम, सिंह शैय्या कहलाता बोधिसत्व ने जोड़ लिया अन्तिम साँसों से नाता।

इसी मध्य भगवान बुद्ध अब प्रथम ध्यान में आए 

उच्च ध्यान में पहुँचे संज्ञा-वेदित निरोध पाये।

परिनिवृत हो गये तथागत, युग का था अवसान

सारे जग का प्राण चल दिया, तज कर के निज प्राण। 

भुवन दीप बुझ गया, आज वैशाख पूर्णिमा ही थी।

ईसा पूर्व चार सौ तिरासी की दो दुःखद घड़ी थी। (पृष्ठ 100-101)

वरिष्ठ समालोचक धर्मेंद्र सुशांत ने तथागत के संदर्भ लिखा कि डॉ मस्ताना ने सामजिक जड़ताओं के उच्छेद के उद्देश्य से बुद्ध गाथा का नवगायन आवश्यक माना, यह एक साहित्यकार के रूप में उनकी सजगता को ही प्रकट नहीं करता बल्कि उनकी समाजोन्मुखता को भाव प्रकट करता है।

संतोष पटेल

नई दिल्ली