काटन वारी आरी है!

निडर बेचाई जारी है,

फिर भी जयजयकारी है;

यद्यपि सब हाहाकारी है,

पग्गलपन सब पर तारी है;

मन की बड़ी बीमारी है,

बुद्धि भ्रष्ट बेचारी है;

धर्म का झगड़ा जारी है,

जाति का परचम भारी है;

आग लगावन वारी है,

हत्या अब खेलवारी है;

अकल सभी की मारी है,

खुद जला राख कर डारी है;

शैतान पर सब कुछ वारी है,

बलिहारी है बलिहारी है!


प्रभाकर सिंह

प्रयागराज (उ. प्र.)