काजल की कोठरी

सारी दुनिया को माना मैंने,

अंधियारी काजल की कोठरी।

हर पग पर है घना अंधेरा,

मानव भरो पुण्य की टोकरी।।


निशदिन परिश्रम जो करता है,

खुशियां जीवन में भरता है।

स्वेद बिंदुओं से करे रोशनी ,

काजल की कोठरी से न डरता है।।


करे सहायता मान सम्मान तो,

स्वजीवन सारा रंगीन बनाता।

भूखे को जो देता भोजन ,

जीवन अपना बाग बनाता ।।


निर्धन का तन ढकने वाला,

तिमिर घटाता मिले उजाला।

बने बुजुर्गों का जो सहारा,

दुख से पड़े कभी नहीं पाला।।


अनाथ बेसहारा बच्चों को,

देता जो अन्न वस्त्र विद्यादान।

काजल की कोठरी की कालिख   

जीवन में न रहता नामोनिशान।।


गीता देवी

औरैया, उत्तर प्रदेश