काशी में

लोकबन्धु राजनरायण जयन्ती 23 नवम्बर 2021 को लेकर पांच दिन काशी में रहा। जनमुख के प्रधान संपादक श्री ब्रजेश कुमार राय और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार का जबरदस्त स्नेह मिला।

लोकतन्त्र सेनानी कुँवर सुरेश सिंह, बड़े भाई बाबू अनिरुद्ध नारायण सिंह  और वरिष्ठ पत्रकार एके लारी में आज भी पहले वाला उत्साह और स्नेह दिखा।

परिवर्तन की चाह से लबरेज पूर्व सांसद श्री अरुण कुमार, श्री महाबल मिश्र और उदयभान राय का साथ मिला। डाक्टर शम्मी कुमार सिंह, रविभान सिंह और आदर्श सिकरवार से काबिले तारीफ ऊर्जा मिली।

मित्र सीपी राय और लोकतन्त्र सेनानी अभय सिन्हा का समर्थन मिला और तकरीबन चौदह साल बाद मिला एक "अनुज" जो काशी को पढ़ रहा रहा है भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचन्द, गुदई महराज और नजीर बनारसी की दृष्टि से।

मन प्रसन्न है। इसी प्रसन्नता को अर्पित है, काशी में

-----------------

भीड़ बहुत है, नीड़ बहुत है, 

तीर बहुत है, काशी में।

कभी नहीं सूखा गंगा का,

नीर बहुत है, काशी में।

अवढर दानी की नगरी का,

गरल ग्रहण करने खातिर,

उत्तर दक्षिण बहती गंगा, 

थीर बहुत है काशी में।

एक तरफ संकट मोचन हैं,

एक तरफ भैरव बाबा, 

कृपा त्रिलोकी छककर पीओ,

क्षीर बहुत है, काशी में। 

तुलसी की धरती कबीर को,

बाँहों में अपने भरकर,

दर्शन में मस्ती उपजाती,

सीर बहुत है, काशी में।

प्रेमचन्द खुद कफ़न लिए हैं, जयशंकर प्रसाद आँसू,

भारतेन्दु के अक्षर कहते,

पीर बहुत है, काशी में।

नवतुगलक के हमले का भी,

करती है प्रतिवाद नहीं,

सह लेती है तोड़फोड़ भी,

धीर बहुत है, काशी में।

भाषा, नस्ल, जात के झगड़े,

यहाँ डूब जाते जल में,

भेद विभेद पचा लेती है,

हीर बहुत है, काशी में।

यहाँ मौत का अर्थ मुक्ति है,

यहाँ युक्ति ही जीवन है,

इसकी संगत पा कायर भी,

वीर बहुत है, काशी में।

- धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव