क्या तुम्हारे पास है कोई जवाब...

इंतज़ार करते-करते

कब में आंख लग गई..पता भी न चला ,


आंखें खुली.. रोशनी थोड़ी कम महसूस हुई

भीतर की भी..बाहर की भी ,

अब चश्मा लगाए रखती हूं हर वक़्त

सब कुछ सही दिखता रहे ताकि


पर, भीतर का क्या..

अंधेरों को उलीचते-उलीचतें

तुम्हारा होना भर महसूस कर पाती हूं ,

आकृतियां बनते-बनते रह जाती हैं हर बार ,


हवाओं में घुल से जाते हैं सभी द्रश्य

देखने से ठीक पहले ही ,

फिर, कैसे कुछ देखूं ?


तब..चुनती हूं उनका रेशा-रेशा

और लिखती रहती हूं..सुनती रहती हूं

तुमसे की गई सारी अनकही बातें ,

ये सुख है, या कि दुख..नहीं पता ,

और बीतती रहती हूं संग उनके उतना ही !!


आखिर कब तक बात करूं

खुद की ओर लौटती हुई इन चुप आवाज़ों से ,

क्या तुम्हारे पास है कोई जवाब.. नहीं न !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ