हमदम

 लिखती नहीं हूं तो शिकायते 

और लिखूदूं तो नाराजगी

बोलूं भी तो क्या बोलूं

जब आंखे सब बोल चुकी हैं

दिल की बातें इश्क की जो

कहें तो भी नागवार दिल को 

और न कहें तो दुश्वार हैं दिल को

दिल की बातें आंखों की शर्म

यहीं तो होता हैं दो दिलों का 

धर्म

न चाह कम होगी न ही राह खत्म होगी

इश्क के सफर में चलते चलेंगे हमसफर

न पाना हैं हमे उस मंजिल को

अगर साथ हैं तेरा तो सफर भी मंजूर हैं

न छूटे हाथ कभी ये अपने

चाहे जमाना करें हमे मजबूर

चल चलते हैं अपनी ही मस्ती में

चाहे दूर तक क्षितिज ही दिखता हो


 जयश्री बिरमी

अहमदाबाद