बीता हुआ वक्त आता नहीं, इंसान करे समय की कद्र।

इस अनित्य जगत में दो ही सत्य है_एक परमात्मा, दूसरा समय। दोनों दुश्यमान न होने के कारण केवल अनुभवागम्य है। नास्तिक भले ही परमात्मतत्व को न स्वीकारते हो, पर समय को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। यदि समय को परमात्मा का स्वरूप कहा जाए तो सिंचित असत्य नहीं, क्योंकि निराकर, निर्विकार अविनाशी, अजन्मा, विभु यदि जो गुण परमात्मा के हैं, वही समय के भी हैं। जिस प्रकार परमात्मा नित्य, सत्य, सनातन, अनादि और अनंत है, उसी प्रकार समय भी इन्हीं गुणों से परिपूर्ण है। सृष्टि का कण_कण समय की आधीनता को स्वीकार करता है। परमात्मा के समान या समय ब्रह्मांड की रचना से पूर्व भी था और बाद में भी रहता है। यह भी मात्र तटस्थ साक्षी और दृष्टा है। सभी को समान अवसर देता है। जैसे एक ही परमात्मा को जो जिस भाव से देखता है, उसी रूप में दिखाई देता है। वैसे ही समय को जो जिस कर्मभाव से आंगीकार करता है, उसी रूप में फल प्रदान करता है। यही उसका घनत्व है, यही उसकी भगवता। चित्रकलाबाधित समय को मनुष्य ने अपनी सुविधाअनुसार भले ही दिन, महीने, वर्ष, युग वह कल्पादि में बांधने का प्रयास किया, पर बांध नहीं पाया। इसे वही बांध सका, जिसने इसका मूल्य समझा और उपासक बन गया। एक बार गुरु ने शिष्य से पूछा से पूछा_वत्स! सबसे बड़ी हानि क्या है? शिष्य ने कहा_गुरुदेव! धन की हनी सबसे बड़ी हानि है। गुरु ने कहा_नहीं वत्स! सबसे बड़ी हानि धन कि नहीं समय की है, क्योंकि नष्ट हुआ धन पुन: प्राप्त किया जा सकता है, पर बीते हुए समय को कोई नहीं पा सकता। जो इसका मूल्य समझता है, समय उसी का होता है। अपनी मातृभूमि संस्कृति और मानवता के बीए अपंण किया गया समय जीवन को अमरत्व दे देता है। वास्तव मैं यही समय की उपासना है और ईश्वर की भी। इसलिए समय को नष्ट ना करें समय वापस नहीं आता।


                            #लक्ष्मी_सिन्हा,

प्रदेश संगठन सचिव महिला प्रकोष्ठ रालोजपा बिहार सह

प्रदेश अध्यक्ष, श्री नारायणी सेवा ट्रस्ट सह राष्ट्रीय अध्यक्ष

                महाकाल सेना दुर्गा शक्ति वाहिनी