क्या आर्थिक स्वतंत्रता का पुनरुत्थान संभव है?

विश्व के प्रत्येक देश के संविधान पर अपने युग और देश की परिस्थितियों का प्रभाव लक्षित होता है। आधुनिक युग की देहरी पर खड़ा भारत का मिश्रित संविधान व्यावहारिक अनुभव के सहारे इतिहास के पुष्टि का प्रमाण है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी समाज की विडंबना यह है कि इसमें मनुष्य न केवल अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को खो चुका है बल्कि वह यह भी नहीं जानता कि वह उसे खो चुका है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में खोई हुई आर्थिक स्वतंत्रता को वापस प्राप्त करने के लिए मनुष्य को यह अनुभव हो जाए कि उसकी कोई मूल्यवान वस्तु गुम हो गई है और वह उसकी तलाश शुरू कर दे। क्या यह संभव है? परंतु सुखभ्रांतिमूलक उपभोक्तावादी संस्कृति की छाया में आर्थिक स्वतंत्रता की संकल्पना निर्मूल साबित हो रही है। आर्थिक स्वतंत्रता के यथार्थ का परिमाप लोकतंत्र की संकल्पनाओं बुनियाद पर खड़ा हुआ है ना कि पूंजीवादी बाजार की विकृतियों पर। आर्थिक क्षेत्र में मनुष्य के बीच जो घोर विषमता पाई जाती है वह उनकी प्राकृतिक असमानता का परिणाम नहीं है बल्कि उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों के स्वामित्व का परिणाम है। विषमता का निराकरण आर्थिक समानता स्थापित करने की जरूरत है। केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टि से लोगों को यह कह देना की संपूर्ण समाज में आर्थिक समानता व्याप्त है। तुच्छ भौतिक संस्कृति का गुणगान करने से नहीं बल्कि मिलजुल कर रहने और मिल बांट कर खाने की परंपरा विकसित होनी चाहिए जो आर्थिक समानता का मूल मंत्र है। जब तक मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तब तक सांस्कृतिक सृजनात्मकता की आशा करना व्यर्थ है। समाज से आर्थिक विषमता का विलोपन आर्थिक समानता का सामाजिकरण भारत जैसे विशाल जन समुदाय के लिए नितांत आवश्यक है। आर्थिक समानता सभ्य समाज की प्रथम शर्त होती है। किसी भी राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया में आर्थिक तत्व, उत्पादन ,विनिमय ,और वितरण पद्धति की भूमिका सबसे प्रधान होती है। भारत में आर्थिक असमानता का दर्शन अपने सिर के बल खड़ा हुआ है अब जरूरत है उसे पैर के बल खड़ा होने की।

 सत्य प्रकाश सिंह

 केसर विद्यापीठ इंटर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश