नवपन्त सजाना होगा

मेघ से कर विद्रोह हमें  धरती पर आना होगा,

हम प्रकाश के पुंज उजाला ही फैलाना होगा।


जीवन का प्रभात बनकर नई रीत बनायेंगे,

डरके नहिं प्राणों की बलि हम हंस के चढायेगें।

हम राहों के अन्वेषी नयी मार्ग बनाना  होगा,

मेघ से कर विद्रोह हमें धरती पर आना  होगा।


हम मतंग से मस्त जीव स्वानों से भय नहीं खाते,

रण का रंग चढ़े जब हम पर गीत शौर्य के गाते।

राणा के वंशज है हम हमें भय को भगाना होगा,

मेघ से कर विद्रोह हमें धरती पर आना  होगा।


विश्व गुरु बन कर हमनें नये द्वार ज्ञान के खोले,

माँ के दत्तक पुत्र नहीं हम सहकर कुछ न बोले।

मानवता का शंख जमीं पर हमें बजाना होगा,

मेघ से कर विद्रोह हमें धरती पर आना  होगा।


भोले भाले निर्मल मन के कंठ में कुहु बोले,

हिंसक वृत्ति न जाने लेकिन ज्वाला से है खेलें।

धरती के है संत हमीं  नवपंत सजाना होगा,

मेघ से कर विद्रोह हमेंधरती पर आना ही होगा।


रचना -

सीमा मिश्रा, बिन्दकी, फतेहपुर