●●●● विजय ●●●●

सुनों, मत करो चिंतन गहन ,

बह जाने दो, कह जाने दो..आंसुओं को,

ये ही त़ो रूपरेखाएं हैं, तुम्हारी श्री विजय की !!

तम तो भ्रम है, वो भी एक क्रम है,

एक अवसर है..प्रभात किरण का ,

फिर डर कैसा, ये भ्रम कैसा ,

निस्वार्थ बढें तो

टल सकती सभी बाधाएं हैं ,

ये ही तो रूपरेखाएं हैं, तुम्हारी श्री विजय की !!

सुनों, उठाओ तो गांडीव..

चढाओ प्रत्यंचा भी ,

कि पराजय सभी तुम्हारी

बन चलेंगीं "सारथी" ,

समय साक्षी है, युग-युग की कथाएं भी ,

जब भी उपेक्षित होता है सच

कमजोरियां ही बन जाती हैं "कवच" ,

प्रयत्न करने से ही बदलती रेखाएं हैं ,

ये ही तो रूपरेखाएं हैं, तुम्हारी श्री विजय की !!

इसलिए कोशिश करो..

अर्जुन बनों..

हां , अर्जुन बनों ..  !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ