सिर और चप्पल

कड़ी धूप में एक बुजूर्ग टेढ़ी कमर के चलते झुका हुआ था। वह अपने काम में मशगूल था। उसे देखकर ऐसा लगा मानो उसकी हड्डियों पर चमडी सुखाने के लिए ही डाली गई है। किसी भी एंगल से वह मुझे इंसान नहीं लग रहा था। बड़ा कमजोर और दुर्बल था वह।

मैं था बड़ी जल्दी मे, सो मैंने जूते मोची को थमाते हुए इतना भर कहा –

“जरा भगवान के लिए जल्दी सी दो।“

मुझे क्या पता वह नास्तिक था।

उसने मेरी क्लास लगाई और कहा – “मैं किसी के लिए भी जूते सी सकता हूँ लेकिन भगवान के लिए हरगिज नहीं। न दिखता है, न सहायता करता है। झूठ-मूठ हमारी सेवाएँ लेकर हमें गुलाम बनाता है। वह राइटी-लेफ्टी किस्म का बंदा था। उसे सेंटर में लाने के उद्देश्य से कहा – कण-कण में है भगवान...। मेरा कथन पूरा हुआ था कि नहीं, वह बोल उठा- “कण-कण छोड़ो, दम है तो मुझ में दिखाओ भगवान?”

मुझे वह सनकी लगा। अब नंगे से तो भगवान भी डरे। फिर हम किस खेत की मूली हैं। सो मैंने हाथ जोड़ लिये। कहा – “महाप्रभु मुझसे गल्ती हुई जो तुम्हारे सामने भगवान का नाम ले बैठा। मेरी दयनीय हालत देखकर तो कम से कम जूते सी दो।“ इस तरह आधे घंटे की जिरह के बाद मैं अपने जूते सिलवाकर वहाँ से चलते बना।

तभी मुझे रास्ते में एक भिखारी दिखायी दिया। वह कड़ाके की धूप में नंगे पैर पागलों की तरह इधर-उधर भटकते हुए भीख माँग रहा था।

यह दृश्य देख मैं तुरंत मोची के पास वापिस गया और कहा – “इस दुनिया में चप्पल की दुकान नहीं है। मैं तो कहता हूँ कि इस धरती पर मोची नाम का कोई जीव होता ही नहीं है। यह सुन मोची ऐसे तिलमिला उठा जैसे उसकी गठबंधन सरकार के चार विधायक छीन लिये हों।

वह बोला – “आप आदमी हैं कि पैजामा। अभी-अभी तो जूते सिलवाकर गए थे, इतने में भूल गए। यह दुकान और में दिखायी नहीं देते?”

तब मैंने कहा – “अगर तुम और तुम्हारी दुकान है तो वह भिखारी नंगे पैर क्यों भटक रहा है? इस पर मोची ने झट से कहा – “इसमें क्या है मैं अभी उसे उसके लायक कोई चप्पल दे देता हूँ, यह कहते हुए भिखारी को चप्पल थमाने लगा।

भिखारी ने चप्पल देख हाथ जोड़ लिये और कहा – “मेरी ऐसी दयनीय हालत देख ही लोगों को दया आती है। भीख दे जाते हैं।“

तब मैंने मोची से कहा – “इसी तरह भगवान हर जगह है। कोई उसे मानता है, कोई उसे नहीं मानता। इसी मानने और न मानने के बीच आस्तिकों और नास्तिकों के कई धंधे फल-फूल रहे हैं। यह दुनिया भगवान के वजूद से धंधा कर सकती है, लेकिन भगवान किसी के सथ धंधा नहीं करता, क्योंकि वह स्वार्थी नहीं है। उसने दुनिया बनायी, और बदले में दुनिया उसे बनाने की कोशिश कर रही है। यही दुनिया का राजकाज है।    

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त