“अहर्निश प्यास “

अपरिमेय सुख जान लिया 

सूखे पत्तों से नमी सोखना 

आंसुओं के सैलाब से 

मुस्कराहट की एक बूँद 

छिछली धूप से ज़ेहन में 

तृप्ति बोध आवास किया 

मुस्कुराने लगी हूँ अब 

अंधड़ ढ़ोते वैरागी मन

तुझमें राग ढूँढ़ लिया 

समतल नही कोई रास्ता 

चलना बेहतर सीख लिया 

प्रत्यक्ष में नही दिखते 

उन वेगों से हंसकर 

लड़ना मैने सीख लिया 

प्रारब्ध के झीने पल को 

आशा बूँदों से सींच लिया 

क्यूँ माँगे उधार के सुख 

कंकर मोती मान लिया 

शिव शिवालय बाहर भीतर

मन दर्पण में जान लिया 

अहर्निश प्यास सुधा की 

मृषा अलाप मान लिया है 


सवि शर्मा 

देहरादून