शरद की यह पूर्णिमा

शरद की यह पूर्णिमा,

समीर बयार चंचल है।

इस गुलाबी शीत में,

तेरी यादें आँचल है।

प्रीत का साक्षी है सुधाकर,

साक्ष्य ये दृग जल है।

बिन तेरे ये जीवन ,

विजन सा मृगजल है।

यादों के पलछिन में,

सँजोये खुशियों के गागर हैं।

उर स्पंदन में बसा,

अथाह प्रीत का सागर है।

इंदु नित बरसाये सुधा,

पर तृषित ही ये पल है।

शरद पूर्णिमा की ज्योत्स्ना में,

दरस को हिय विकल है।

        रीमा सिन्हा (लखनऊ)