आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में नीली अर्थव्यवस्था जिसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उपसमूह के रूप में माना जाता है, एक महत्वपूर्ण स्त्रोत होगी

गोंदिया - भारत वर्तमान में टीकाकरण अभियान करीब-करीब 100 करोड़ तक पहुंच गया है और बड़ी तेजी के साथ कोरोना महामारी को मात देता हुआ भारत तात्कालिक तीव्रता से अपने विकास के लक्ष्यों की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर चुका है।हालांकि इसकी गति को पिछले डेढ़ साल की भयंकर कोरोना महामारी की त्रासदी ने कुछ हद तक नुकसान पहुंचाया और विकास को डेढ़ साल पीछे कर दिया पर हम जांबांज़ भारतीय भी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं, अपना जज़्बा और जांबाज़ी को कायम रखते हुए अपने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य और 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था में परिलक्षित कर विजय पताका फहराने कासंकल्प को पूरा करने के लिए नवोदय नीली अर्थव्यवस्था जो, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उपसमूह के रूप में भी जानी जाती है इसको विज्ञान प्रौद्योगिकी की सहायता से समृद्ध करने के लिए विभिन्न संसाधनों का उपयोग करने के लिए, डीप ओशन मिशन,,पहले ही शुरू है।अतःहमारे लिए नीली अर्थव्यवस्था की समृद्धि के लिए अनुसंधान प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप की महत्वपूर्ण भूमिका होगी और इस नई नीली अर्थव्यवस्था बिल्डिंग से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत दिशा और 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण कारक सिद्ध होगी।साथियों बात अगर हम नीली अर्थव्यवस्था को समझने, इसकी परिभाषा की करें तो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अनुसार, नीली अर्थव्यवस्था समुद्री पर्यावरण के दोहन , संरक्षण और पुनर्जनन से संबंधित अर्थशास्त्र में एक शब्द है। इसकी व्याख्या का दायरा संगठनों के बीच भिन्न होता है। हालांकि, तटीय संसाधनों के लिए एक सतत विकास दृष्टिकोण का वर्णन करते समय आमतौर पर इस शब्द का प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय विकास के दायरे में किया जाता है। इसमें आर्थिक क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल हो सकती है, अधिक पारंपरिक मत्स्य पालन जलीय कृषि ,समुद्री परिवहन, तटीय, समुद्री और समुद्री पर्यटन, या अन्य पारंपरिक उपयोग, तटीय नवीकरणीय ऊर्जा जैसे अधिक आकस्मिक स्थानों के लिए। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं (अर्थात नीलाकार्बन) समुद्र तल खनन और जैव पूर्वेक्षण। एक संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि ने हाल ही में नीली अर्थव्यस्था को एक ऐसी अर्थव्यवस्था के रूपमें परिभाषित किया है जिसमें आर्थिक क्षेत्रों और संबंधित नीतियों की एक श्रृंखला शामिल है, जो एक साथ निर्धारित करते हैं कि क्या महासागर संसाधनों का उपयोग टिकाऊ है। नीली अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण चुनौती समुद्री के कई पहलुओं को समझना और बेहतर प्रबंधन करना है। सतत मत्स्य पालन से लेकर पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से लेकर प्रदूषण को रोकने तक।दूसरी बात, नीली अर्थव्यवस्था हमें यह महसूस करने की चुनौती देती है कि समुद्र के संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के लिए विभिन्न प्रकार की साझेदारियों के माध्यम से सीमाओं और क्षेत्रों में सहयोग की आवश्यकता होगी और ऐसे पैमाने पर जो अभी तक नहीं हुआ है। पहले हासिल किया गया था। साथियों इसे अगर हम साधारण शब्दों में समझेंतो इसकी परिभाषा, नीली अर्थव्यवस्था से अभिप्राय आर्थिक विकास बेहतर आजीविका और रोजगार के लिए महासागरीय संसाधनों का सतत उपयोग करते हुए महासागर पारिस्थितिकी - तंत्र के स्वास्थ्य को संरक्षित करने से है। मत्स्य पालन, गहरे समुद्र में खनन और अपतटीय तेल एवं गैस भारत की नीली अर्थव्यवस्था के बड़े घटक हैं। केंद्र सरकार नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहती है। आपको बता दें कि भारत तीन ओर से सुमुद्र से घिरा हुआ है। ऐसे में नीली अर्थव्यवस्था पर फोकस बढ़ाकर देश की आर्थिक ग्रोथ को बढ़ाया जा सकता है। भारत के कुल व्यापार का 90 फीसदी हिस्सा समुद्री मार्ग के जरिए होता है। समुद्री रास्तों, नए बंदरगाहों और समुद्री सामरिक नीति के जरिये अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना ही ब्लू इकोनॉमी कहलाता है,साथियों बात अगर हम नीली अर्थव्यवस्था के भारत के लिए महत्व की करें तो, भारत की आर्थिक संवृद्धि हेतु हिंद महासागर क्षेत्र रणनीतिक महत्त्व रखता है क्‍योंकि भारत का अधिकांश कच्चा तेल और गैस समुद्र के जरिये आयात किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इस निर्भरता में वर्ष 2025 तक अत्यधिक तीव्रता से वृद्धि होने की आशा है। भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्र, 20 लाख वर्ग किलोमीटर से भी अधिक का है, इसके अंतर्गत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के दोहन करने योग्य संसाधनों के साथ-साथ विशाल मात्रा में जीवित और निर्जीव संसाधन भी विद्यमान हैं।साथियों बात अगर हम नीली अर्थव्यवस्था को भारत के आत्मनिर्भर भारत बनाने के महत्वपूर्ण घटक की करें तो हमारे पीएम भी कह चुके हैं, कि नीली अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण स्रोत होगी। बंदरगाहों तथा तटीय सड़कों को कनेक्ट किया जा रहा है और इसका फोकस मल्टीमोड कनेक्टिविटी पर है।उन्होंने कहा कि हम अपने तटीय क्षेत्र को जीवन यापन की सुगमता तथा व्यापार-सुगमता के रोल मॉडल में बदलने के उद्देश्य से काम करें। साथियों बात अगर हम दिनांक 18 अक्टूबर 2021 को केंद्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी पीएमओ मंत्री द्वारा नीली अर्थव्यवस्था में अनुसंधान प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप की भूमिका विषय पर आयोजित संवाद में संबोधन की करें तो पीआईबी की विज्ञप्ति अनुसार उन्होंने भी कहा कि, भारत की नीली अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के एक उपसमूह के रूप में माना जाता है, जिसमें देश के कानूनी अधिकार क्षेत्र के तहत बंदरगाह, समुद्र और समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में पूरी महासागर संसाधन प्रणाली और मानव निर्मित आर्थिक बुनियादी ढांचा भी शामिल है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे उन वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में मदद मिलती है, जिनका आर्थिक प्रगति, पर्यावरण संबंधी स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ स्पष्ट संबंध है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे तटीय देशों के लिए नीली अर्थव्यवस्था सामाजिक लाभ के लिए समुद्री संसाधनों का जिम्मेदारी के साथ उपयोग करने का एक व्‍यापक सामाजिक -आर्थिक अवसर प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भारत का भविष्य में होने वाला विकास विज्ञान संचालित अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है। उन्‍होंने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा आयोजित आजादी का अमृत महोत्सव सप्ताह के उद्घाटन सत्र में, इस संचेतना के साथ कहाकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी भारत के समावेशी विकास के लिए मुख्य मुद्रा बनने जा रही है यह अगले 25 वर्षों की योजना बनाने का अवसर भी है। उन्होंने कहा कि भारत के महासागर हमारे लिए ख़जाना हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, आत्मनिर्भर भारत के निर्माणमें नीली अर्थव्यवस्था जिसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उपसमूह के रूप में माना जाता है, एक महत्वपूर्ण स्त्रोत होगी तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में नीली अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण घटक जिसे समृद्ध करने विज्ञान प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। 

-संकलनकर्ता- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र