"आज़ाद भोर का इंतज़ार"

हमारे आसपास नज़र करेंगे तो घर, परिवार, पड़ोस, समाज या हर क्षेत्र में लड़कीयाँ और महिलाएं कहीं न कहीं अपना अधिकार पाने की लडाई लड़ती हुई नज़र आएगी। आजकल की लड़कियां अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़ रही है, पढ़ लिखकर पैरों पर खड़े रहना सीख गई है, पति के कंधे से कंधा मिलाकर संसार रथ को खिंचने में सक्षम भी हो गई है, टु व्हीलर, फोर व्हीलर और यहाँ तक कि हवाई जहाज उड़ाना भी सीख गई है, फिर भी कहीं महिलाओं के हुनर की कद्र होती है तो कहीं नहीं होती। 

महिलाएं कितनी भी आगे निकल जाए कुछ लोगों की नज़रों में कम अक्कल, और पैरों की जूती बराबर ही रहती है।

कुछ लड़कियां लड़कों से भी आगे निकल रही है, हर कोई तारीफ़ भी कर रहा है। तो दूसरी ओर कुछ लड़कियों के लिए कुछ भी नहीं बदला। 

सदियों से हर जाति, हर मजहब, हर समाज और हर देश की कुछ महिलाएं आज भी अपना हक और अधिकार पाने की जद्दोजहद कर रही है। कुछ महिलाओं की एक लडाई सदियों से चली आ रही है न घर में उनको सम्मान मिलता है, न समाज में।

सऊदी अरब को दुनिया में उन देशों में माना जाता है जहां पर महिलाओं पर अभी भी सदियों पुराने कड़े नियम, रूढ़िवादिता व सख्त कानून लागू है। सऊदी अरब में महिलाएं फिर भी हर बार अपने हक की लड़ाई लड़ कर आगे बढ़ी है। सऊदी अरब में हर चीज के लिए वहां की महिलाओं ने कड़ा संघर्ष किया है चाहे वह स्कूल में दाखिला लेना हो, चाहे पहचान पत्र बनवाना हो, या जबरन विवाह पर प्रतिबंध लगवाने हो। महिलाओं ने हर बार साबित किया है कि वे किसी से कम नहीं है और अपने हक की लड़ाई खुद लड़ सकती है।

सऊदी अरब दुनिया का इकलौता देश था जहां महिलाओं के गाड़ी चलाने पर पाबंदी थी। इस देश में पिछले 50 से ज्यादा सालों तक महिलाओंं को सिर्फ पीछे की सीट पर बैठे हुए देखा जा सकता था। सऊदी अरब में महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के विजन 2030 से मुमकिन हो पाया है। क्राउन प्रिंस ने पिछले साल सितंबर में महिलाओं के गाड़ी चलाने पर लगे प्रतिबंध को हटाने का ऐलान किया तब जाकर महिलाओं को ये हक मिला। 

इससे बड़ा दु:ख तो यह है कि आज भी अधिकांश महिलाएं अपने अधिकारों और हक के बारे में सही तरीके से जानती तक नहीं है।

आज 21वीं सदी में कुछ महिलाएं रुढिवादी परंपराओं को तोड़कर आगे तो बढ़ रही है पर एक भी हक सहज तरीके से नहीं मिला। सदियों से हर देश की, हर धर्म की महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा। हर देश की जानी-मानी लेखिकाओं को स्त्री विमर्श में आग उगलते शब्दों से पन्नों को जलाना पड़ा और आज भी कहीं न कहीं महिलाएं अपने हक के लिए लड़ ही रही है। आज भी स्त्री विमर्श में लेखकों को कलम चलानी पड़ रही है मतलब आज भी महिलाओं को संपूर्ण स्वराज नहीं मिला और आगे भी जानें कितने साल और सदियों तक इंतज़ार करना पड़ेगा। क्या कोई एक भोर ऐसी भी खिलेगी जिसकी किरणें हर स्त्री के लिए आज़ादी का संदेश लेकर आएगी।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु,कर्नाटक)