चाह मेरी बस यही

उठे जब भी कलम,

मैं लिखती जाऊं,

जग पढ़ता जाए,

कलम कभी रूके नही,

दुनिया कभी रूठे नही,

चाह मेरी बस यही।

कुछ ऐसा लिख जाऊं,

जिससे जग जागे,

अन्तर्मन जागे,

ज्ञान का प्रकाश हो,

अज्ञानता का नाश हो,

चाह मेरी बस यही।

रोते को हंसा दूं,

सोते को जगा दूं,

भटके को राह दिखा दूं,

बिछड़े को गले मिला दूं,

मैं रहूं या न रहूं,

चाह मेरी बस यही।

सच का आगाज करा दूं,

धर्म की राह दिखा दूं,

ईश्वर मे आस्था करा दूं,

देश भक्ति का पाठ पढ़ा दूं,

शिष्टाचार का भान करा दूं,

चाह मेरी बस यही।

प्रियंका पांडेय त्रिपाठी