छुआ तुमने मन को

कहो किसी विधि से छुआ तुमने मन

हृदय में कोई भी समाता नही

ये सच है हृदय बहक जाता किंतु

किसी द्वार पर ये ठहरता नही...

नशीले नयन हों या दैहिक पवन हों

सागर की उठती उतरती लहर हो

मगर कोई जादू छलता नही

मेरे मन का कामी मचलता नही

ये बादल तो ऐसा बचे ही न तृप्ति

किसी दर को जाए गरज ले तड़क ले

उमड़ता है लेकिन बरसता नही...

परायण जो मेरा यहां से कभी हो

मैं चाहूंगा तुम ही मेरी सखी हो

कोई भी सुर मुझपे सजता नही है

तुम्हारे अलावा कुछ भी बचता नही है


डिम्पल राकेश तिवारी

अयोध्या-उतर प्रदेश