समीक्षा और समीक्षक

जिस प्रकार लिखते समय लेखक को बहुत बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ता है उसी प्रकार उसके लेखन की समीक्षा करते समय एक समीक्षक को भी पक्षपात से दूर रहकर निष्पक्ष तरीके से लेखन के प्रत्येक पहलू को बारीकी से देखना होता है या यूं कहें लेखन के गुण दोषों को बहुत ही ध्यान से लेखक के समक्ष लाना होता है ताकि लेखक अपनी लेखनी में अपेक्षित सुधार ला पाए।समीक्षा करने वाले को स्वयं भी साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों एवम विधाओं में अनुभवी एवं लेखन कला में दक्ष होना चाहिए ताकि लेखन की समीक्षा के साथ वह पूरा पूरा न्याय कर सके ।उसे जहां एक और बेहतरीन लेखन को बिंदास तरीके से खूब सराहना चाहिए वहीं दूसरी ओर लेखन के कमजोर और सुधार अपेक्षित क्षेत्रों पर लेखनी की स्वस्थ आलोचना भी करनी चाहिए ।यदि लेखक स्वयं की लेखनी में सुधार चाहता है तो वह समालोचक अथवा समीक्षा की समीक्षा को सकारात्मक रूप में लेगा। परंतु यदि लेखक के भीतर अपनी वाही वाही करवाने का रोग पैदा करने वाला वायरस घर कर चुका है तो वह समीक्षक की निष्पक्ष समीक्षा पर प्रश्न चिन्ह जरूर लगाएगा।

मैं स्वयं ना तो एक बेहतर लेखिका हूं और ना ही एक बेहतर समीक्षक और शायद यही वजह है कि मैं अधिकतर मौकों पर समीक्षा करने से बचने का प्रयास करती हूं क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरे अल्प ज्ञान की वजह से मैं किसी भी रचनाकार की रचना के साथ अन्याय कर डालूं। अपनी गलतियां मानने और अपनी कमियों को सबके सामने स्वीकार करने में मुझे कभी कोई संकोच नहीं रहता ।साथ ही जहां,जिससे, जिस भी जगह से कुछ भी नया और बेहतर सीखने को मिलता है तो बिलकुल सच बता रही हूं कि वहां मेरा प्रयास होता है कि मैं उस मौके को कदाचित न गवाऊं। दोस्तों, दुनिया में कोई भी इंसान संपूर्ण और सर्वगुण संपन्न नहीं होता। सुधार और सीखने की गुंजाइश आजीवन बनी ही रहती है ।अपनी कमियों को स्वीकार कर हम अपनी लेखनी को परिष्कृत और परिमार्जित कर सकते हैं ।मेरा स्वयं का अनुभव रहा है कि जो भी थोड़ा बहुत ज्ञान मुझे लेखन के विषय में है वह यकायक एक ही झटके में नहीं मिला, अपितु ,आप जैसे गुणी,पारखी और विवेकी साहित्यकार मित्रों की संगत में रहकर काफी कुछ सीखने को मिला है और यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। आज जब मैं अपनी सबसे पहली रचना और आज की बिल्कुल ताजातरीन रचना एक साथ सामने रखकर पढ़ती हूं तो दोनों में फर्क मुझे स्वयं नजर आने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।सीखने की कोई उम्र नहीं होती हम हर पल हर दिन हर लम्हा कुछ ना कुछ नया सीखते हैं और सीखने की चाह वह हमेशा हमें अपने भीतर बरकरार रखनी चाहिए जिस दिन यह चाह,यह इच्छा खत्म हो जाएगी उस दिन हमारे लेखन पर स्वत:एक बहुत बड़ा विराम चिन्ह लग जाएगा और हमारा साहित्यिक विकास उसी क्षण से अवरुद्ध होने लगेगा।

इसलिए सही सटीक और निष्पक्ष समीक्षा के लिए एक लेखक को सदैव ही समीक्षक अथवा समालोचक का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने आपकी उन कमियों को आपके समक्ष उजागर किया है जो आप लिखते वक्त स्वयं भी नहीं देख पाए। तो दोस्तों ,अपने जिन कमजोर क्षेत्रों पर आप पहले काम नहीं कर पाए, समीक्षक ने आपको पुन: उन weak areas पर काम करने का मौका दिया है तो हमें उस मौके का फायदा उठाकर अपने लेखन को दुरुस्त करने के लिए निसंकोच पुनः प्रयास करना चाहिए और पहले से बेहतर लिखने की ओर अपना कदम बढ़ाना चाहिए।

पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली